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Monday, February 20, 2017

या कब्रिस्तान चुनें या फिर श्मशानघाट! संवैधानिक पद से जब कब्रिस्तान के बदले श्मशानघाट बनाकर गांवों के विकास का खुल्ला ऐलान चुनाव का मुद्दा हो जाये,जब बहस गधे के विज्ञापन पर हो,तब वोटर चाहे जो फैसला करें आगे बेड़ा गर्क है। नया यह हुआ है कि अमेरिकी मीडिया अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ हो गया है। फर्क भारत और अमेरिका में बस इतना ही है कि भारत का मीडिया जनता के खिलाफ हो गया है और उसका सच ह

या कब्रिस्तान चुनें या फिर श्मशानघाट!

संवैधानिक पद से जब कब्रिस्तान के बदले श्मशानघाट बनाकर गांवों के विकास का खुल्ला ऐलान चुनाव का मुद्दा हो जाये,जब बहस गधे के विज्ञापन पर हो,तब वोटर चाहे जो फैसला करें आगे बेड़ा गर्क है।

नया यह हुआ है कि अमेरिकी मीडिया अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ हो गया है।

फर्क भारत और अमेरिका में बस इतना ही है कि भारत का मीडिया जनता के खिलाफ हो गया है और उसका सच हुक्मरान का सच है।

कमसकम इस बंटवारे के बाद यूपी के चुनाव नतीजों का इंतजार अब मत करें।

पलाश विश्वास

किसी गांव को कितने कब्रिस्तान या कितने श्मशानघाट चाहिए,अब यह सवाल फिजूल है।दोनों बराबर हैं।कब्रिस्तान बनना है तो श्मसानघाट बनाना जरुरी है और श्मशानघाट बनाने के लिए कब्रिस्तान जरुर बनना चाहिए।

रामराज्य में समरसता की यह अजब गजब समता अब फासिज्म का राजकाज है।फसल जनादेश है।यही लोकतंत्र का अजब गजब सच भी है।

मुक्तबाजारी विकास का व्याकरण भी यही है।सुनहले दिनों का यही चेहरा है।

कहां तो छप्पन इंच का सीना तना हुआ था कि नोटबंदी पर जनादेश होगा और कहां बातें चलीं तो हम या तो श्मशानघाट में हैं या फिर कब्रिस्तान में।

अंतिम संस्कार का फंडा़ भी यही है कि जिंदगी के इस लोक में जिसे कुछ न दिया हो,उसे परलोक में अमन चैन से बसने या उनकी उत्पीड़ित वंचित आत्मा की मुक्ति के लिए कर्म कांड के मार्फत अपनी अपनी आस्था के मुताबिक चाक चौबंद इंतजाम कर दिया जाये।समाज इसका इंतजाम खुद करता है।समुदाय की आस्था तय करती है कि अंतिम संस्कार की जगह कैसी हो।परिजन और पुरोहित कास्टिंग में होते हैं।

जाहिर है कि श्मसानघाट या कब्रिस्तान बेहद जरुरी हैं लेकिन मुश्किल यह है कि बिना जरुरत इन्हें इफरात में जहां तहां बना देने का लोक रिवाज नहीं है।बल्कि मौत से जुड़े होने के कारण रिहायशी इलाकों में ऐसे स्थान घाट बनाने से लोग परहेज करते हैं।

बनारस में घाट बहुत देखे हैं,श्मशानघाट कितने हैं,गिने नहीं हैं।

अब श्मशानघाटों पर ही क्वेटो स्मार्ट शहर तामीर होना है,जाहिर है।

बाकी तरक्की की आलीशान इमारतें,न जाने कितने ताजमहल इन्हीं कब्रिस्तानों में या श्मशान घाटों में तामीर होंगे और न जाने कितने करोड़ लोगों के हाथ काट दिये जायेंगे।ये ही हमारे सुपरमाल हैं,स्मार्ट शहर हैं और विकसित गांवों की तस्वीर भी यही।

यह सिलसिला जारी रहना चाहिए,ताकि हम सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भुखमरी ,बेरोजगारी और मंदी के बावजूद,उत्पादन प्रणाली तहस नहस हो जाने के बावजूद बनसकें और देश कैसलैस डिजिटल नोटबंदी के बाद बनाया जा सके।

जिन्हें जल जंगल जमीन की फिक्र जरुरत से ज्यादा है और जो बेइंतहा बेदखली के खिलाफ लामबंद हैं,वे भी समझ लें कि कहां कहां कैसे कैसे ऐसे श्मसानघाट और कब्रिस्तान बनाये जाने वाले हैं।हुक्मरान की मर्जी,मिजाज और इरादा समझ लें।

यह न कविता है और न पहेली।कविता लिखना छोड़ दिया है और पहेली हम बनाते नहीं हैं।बहरहाल हालात कविता की तरह रोमांचक हैं तो पहेली की तरह अनगिनत भूलभूलैया का सैलाब।जी,हां यह मजहबी सियासत का तिलिस्म है जो कारपोरेट भी है और मुक्तबाजारी भी।व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र अबाध पूंजी के ।

अब डंके की चोट पर बाबुलंद ऐलान हो गया कि हमारे तमाम गांवों में श्मशान घाट और कब्रिस्तान बराबर बनेंगे।स्कूल,कालेज,अस्पताल जैसी चीजों में बराबरी की बात चूंकि हो नहीं सकती, हक हकूक में बराबरी चूंकि हो नहीं सकती, मौकों में बराबरी चूंकि हो नहीं सकती,सर्वत्र नस्ली भेदभाव है तो जाति धर्म नस्ल में बंटे समाज के हिस्से में समता का यह नजारा कब्रिस्तान के मुकाबले श्मशानघाट बनता ही है।

मजहबी सियासत से अब कब्रिस्तान या श्मशान घाट के अलावा कुछ नहीं मिलनेवाला है।सारे चुनावी समीकरण और जनादेश का कुल नतीजा यही है,जिसका पहले ही ईमानदार हुक्मरान ने सरेआम ऐलान कर दिया है।

उन्हें धन्यवाद  या शुक्रिया अपने अपने मजहब से कह दीजिये और कमसकम इस बंटवारे के बाद यूपी के चुनाव नतीजों का इंतजार अब मत कीजिये।

जाहिर सी बात है कि संवैधानिक पद से जब कब्रिस्तान के बदले श्मशानघाट बनाकर गांवों के विकास का खुल्ला ऐलान चुनाव का मुद्दा हो जाये,जब बहस गधे के विज्ञापन पर हो,तब वोटर चाहे जो फैसला करें आगे बेड़ा गर्क है।

गधे फिरभी बेहतर हैं।

उनकी आस्था हिंसा नहीं है।

वे उत्पीड़ित वंचित शोषित हैं और आम जनता के मुकाबले उनका स्टेटस कुछ भी बेहतर नहीं है।लेकिन गधे का कोई मजहब नहीं होता और न गधे मजहब के नाम बंटे होते हैं।

न गधों की संस्कृति वैदिकी हिंसा है और न गधों को अंतिम संस्कार के लिए किसी कब्रिस्तान या श्मशानघाट जाने की जरुरत है और न इस दुनिया में कहीं किसी कत्ल या कत्लेआम में गधों का कोई हाथ है ।

जाहिर है कि गधे हमेशा प्रजाजन हैं,हुक्मरान नहीं जो पूरे मुल्क को या कब्रिस्तान या फिर श्मसानघाट बनाकर रख दें।

कृपया गौर करें,हम पिछले 26 सालों से रोज इन्हीं कब्रिस्तानों और श्माशान घाटों के बारे में लिखते बोलते रहे हैं,किसीकी समझ में बात नहीं आयी।अब कमसकम वे कब्रिस्तान और श्मशान घाट के हकीकत पर बहस हो रही है।

अब भी असलियत जो समझ न सकें ,वे चाहे जिसे वोट दें,या न दें,इससे देश में कुछ भी बदलने वाला नहीं है।उनका भी मालिक राम है।रामभरोसे पूरा देश है।

जनगणमण बनाम वंदेमातरम् बहस फिजूल है।

राष्ट्रगान गीत दोनों अब राम की सौगंध है।भव्य राम मंदिर वहीं बनायेंगे।

बहरहल भारत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे 11 मार्च को आने वाले हैं।2014 में भी एक नतीजा आया था।नतीजों के असर पर बहस का कोई मतलब नहीं है।चुनावी समीकरण से सत्ता का फैसला आने वाला है,वह चाहे जो हो उन राज्यों का या देश का किस्मत बदलने वाला नहीं है।

उम्मीदें बहुत हैं सुनहले दिन भगवा जमीन पर बरसने के और बिन मानसून बादल भी खूब उमड़ घुमड़ रहे हैं।

बादल बरसे या न बरसे,हालात या कब्रिस्तान है या फिर श्मशानघाट।

उत्पादन केंद्रों में, खेतों में, कल कारखानों में, दफ्तरों में खेतों खलिहानों से लेकर बाजारों में, गांवों,जनपदों से लेकर महानगरों तक हम दसों दिशाओं से कब्रिस्तान से घिरे हुए हैं और आगे और और कब्रिस्तान और श्मसानघाट  बनाने का वादा है।

हुजुर, इस ऐलान से घबराने या भड़कने की कोई जरुरत नहीं है।

हो सकें तो जमीन पर सीधे खड़े होकर हवाओं की खुशबू को पहचानें और जमीन के भीतर हो रही हलचलों को समझकर,मौसम,जलवायु और तापमान को परख कर  आने वाली आपदाओं के मुकाबले तैयार हो जायें।

राजनीतिक रुप से सही होने पर हालात बेकाबू है और यही सच का सुनामी चेहरा है।अब पहले कौन मारे जायेंगे,अपनी अपनी मौत देर तक टालने की लड़ाई है और कुरुक्षेत्र में सत्ता विमर्श और युद्ध पारिस्थितकी यही है।हर किसी के लिए चक्रब्यूह है।

क्योंकि अब हमारे पास विकल्प सिर्फ दो हैं या कब्रिस्तान या फिर श्मशानघाट।

क्योंकि अब हमारे पास तीसरा कोई विकल्प नहीं बचा है।

यह मुक्तबाजार का सच जितना है ,उसे बड़ा सच मजहबी सियासत का है।

सबसे बड़ा सच हमारे लोकतंत्र और हमारी आजादी का है कि हुक्मरान हमें श्मसानघाट और कब्रिस्तान के अलावा कुछ भी देने वाले नहीं हैं।जो सुनहले दिन आने वाले हैं,वे दरअसल इन्ही श्मशानघाट या कब्रिस्तान के सुनहले दिन हैं।

यूपी के कुरुक्षेत्र में तीसरे चरण के मतदान में कुल इकसठ फीसद वोट पड़े हैं।कहीं कहीं ज्यादा भी वोट गेरे गये हैं।जिनने वोट नहीं दिये ,कुल उससे बी कम वोट पाकर सरकारें खूब बन सकती हैं और चल दौड़ भी सकती हैं।फासिज्म के राजकाज का यही रसायन शास्त्र ,जैविकी और भौतिकी विज्ञान है।

अमेरिका में तो महज 19.5  फीसद जनता के वोट से ग्लोबल हिंदुत्व के नये ईश्वर का अाविर्भाव हुआ है।जबकि उनके खिलाफ वोट 19.8 फीसद है।

सारी विश्वव्यवस्था बदल गयी है।

उपनिवेश में सत्ता बदल जाने से कयामत का यह मंजर बदलने वाला नहीं है।

अब हालात यह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति स्वीडन में आतंकवादी हमला करा रहे हैं।यह अमेरिका का पहला झूठ भी नहीं है।

खुल्ला सफेद झूठ कहने के लिए मीडिया से दुश्मनी तकनीकी तौर पर गलत है।सारे के सारे अमेरिकी राष्ट्रपति झूठ पर झूठ बोलते रहे हैं।

दुनियाभर में युद्ध, गृहयुद्ध, विश्वयुद्ध में उन्हींके हित दुनिया के हित बताये जाते हैं।ईरान इराक अफगानिस्तान लीबिया मिस्र से लेकर सीरिया तक तमाम ताजे किस्से हैं।हम दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में अमेरिकी सैन्यशक्ति के शिकंजे में हैं और अमेरिकी हित भारत के सुनहले दिन बताये जा रहे हैं।साधु।साधु।

नया यह हुआ है कि अमेरिकी मीडिया अमेरिकी राष्ट्रपति के खिलाफ हो गया है।

फर्क भारत और अमेरिका में बस इतना ही है कि भारत का मीडिया जनता के खिलाफ हो गया है और उसका सच हुक्मरान का सच है।

जम्हूरियत के जश्न में या तो हुक्मरान बोल रहे हैं या मीडिया बोल रहा है,आम जनता की कोई आवाज नहीं है।

गूंगी बहरी जनता को बदलाव के ख्वाब देखने नहीं चाहिए और वह देख भी नहीं रही है।इसीलिए हत्यारों के सामने खुला आखेट है और चांदमारी जारी है।

इसीलिए विकल्प या कब्रिस्तान है या फिर श्मसानघाट।

अब आप ही तय करें कि आपका विकल्प क्या है।

रांची से ग्लाडसन डुंगडुंग का अपडेट हैः

झारखंड का गुमला जिला जहां आदिवासियों के जमीन लूट के खिलाफ 'जान देंगे, जमीन नहीं देंगे' जैसे नारा की उत्पत्ति हुई, आज इस जिले के आदिवासियों ने एक बार फिर से प्राकृतिक संसाधनों के कॉरपोरेट लूट के खिलाफ जंग छेड़ दिया है। अब वे नारा दे रहे हैं... आदिवासियों को धर्म के नामपर बांटना बंद करो... हम सब एक हैं... जल, जंगल, जमीन हमारा है...रघुवर दास छत्तीसगढ़ वापस जाओ... आदिवासी विधायक स्तीफा दो... 16-17 फरवरी 2017 को भारत सरकार, झारखंड सरकार और कॉरपोरेट जगत के लोग रांची में झारखंड की जमीन, खनिज, जंगल, पहाड़ और पानी का विकास के नाम पर सौदा कर रहे थे उसी समय गुमला में प्राकृतिक संसाधनों के इस कॉरपोरेट लूट के खिलाफ हजारों आदिवासी लोग आपनी आवाज बुलंद कर रहे थे। एक बात तो तय है कि ये आग जो झारखण्ड में लगी है और झारखण्ड सरकार उसमें बार-बार घी डाल रही है, ये आग बुझेगी नही--

हिमांशु कुमार ने लिखा हैः

समाज के अन्याय के मामलों में कानून का बहाना बनाने वालों को ये भी स्वीकार कर लेना चाहिये कि जनरल डायर का गोली चलाना कानूनी था,

भगत सिंह की फांसी भी कानूनी थी,

सुक़रात को ज़हर पिलाना कानूनी था,

जीसस की सूली की सज़ा कानूनी थी,

गैलीलियो की सज़ा कानूनी थी,

भारत का आपातकाल कानूनी था,

गरीबों की झोपडियों पर बुलडोजर चलाना कानूनी है,

पूरी मज़दूरी के लिये मज़दूरों की हड़ताल गैरकानूनी है,

अंग्रेज़ी राज का विरोध गैरकानूनी था,

सुकरात का सच बोलना गैरकानूनी था,

यह बिल्कुल साफ है कि कानून और गैरकानूनी तो ताकत से निर्धारित होते हैं,

आज आपके पास ताकत है इसलिये हमारा इन्साफ मांगना भी गैर कानूनी है,

कल जब हमारे हाथ में ताकत होगी तब ये आदिवासियों की ज़मीनों की लूट, मुनाफाखोरी और अमीरी गैरकानूनी मानी जायेगी,


Sunday, February 19, 2017

जब प्रेतात्माों से मीडिया का काम चल सकता है,तो मनुष्यों को मीडिया की कोई जरुरत नहीं है। मीडियाकर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी! पलाश विश्वास

जब प्रेतात्माओं से मीडिया का काम चल सकता है,तो मनुष्यों को मीडिया की कोई जरुरत नहीं है।

मीडियाकर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी  भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी!

पलाश विश्वास

मीडियाकर्मी इसे अच्छीतरह समझ लें कि उनकी कार्यस्थितियों को नर्क बनाने से लेकर उनका सीआर खराब करने और उसीके आधार पर उन्हें काम से निकालने में मीडिया के मसीहा तबके की शैतानी भूमिका हमेशा निर्णायक होती है।कारपोरेट हितों के मुताबिक अपनी चमड़ी बचाने और जल्दी जल्दी सीढ़ियां छंलागने के लिए यह तबका किसी की भी बलि चढ़ाने से हिचकता नहीं है।

1991 से मीडिया में गैरपत्रकारों की छंटनी का विरोध पत्रकारों ने कभी नहीं किया है और यूनियनों के नेतृत्व में रहे पत्रकारों ने सबसे पहले गैरपत्रकारों की कुर्बानी देकर आटोमेशन तेज किया है।

यह भोगा हुआ यथार्थ है कि यूनियनें मालिकान की पहल पर चुनिंदा पत्रकारों की अगुवनाई में ही बनीं,जिसने पत्रकारों और गैरपत्रकारों की बलि चढ़ाकर अपनाकैरियर सवांरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।आज के हालात के लिये यह क्रांतिकारी मसीहा तबका मालिकानव से ज्यादा जिम्मेदार हैं।आगे मीडियाकर्मी ऐसी गलती न दुहरायें तो बेहतर।

इसी आटोमेशन के खिलाफ आवाज उठाने में मेरा अपने सीनियर साथियों से दुश्मनी भी मोल लेनी पड़ी है।लेकिन हम अपने साथियों को बचाने में नाकाम रहे हैं।

अब हम अनेक संपादकों और अपने पुराने सीनियर जूनियर साथियों के क्रांतिकारी तेवर से ज्यादा चकित हैं,जिन्होंने पेशेवर जिंदगी में हमेशा कारपोरेट हितों के मुताबिक बाजार के व्याकरण के मुताबिक पत्रकारिता की है और नौकरी में रहते हुए कारपोरेट लूट खसोट और जल जंगल जमीन के हकहकूक की आवाज उठाते जनपदों और जनसमूहों के उत्पीड़न सैन्य दमन से लेकर मेहनतकश तबकों के आंदोलन और बहुजनों पर सामंती अत्याचारों के खिलाफ बाकी मीडियाकर्मियों की तुलना में नीतिगत फैसलों की बेहतर स्थिति के बावजूद पिछले छब्बीस सालों में एक पंक्ति भी नहीं लिखी है और न अपने साथियों के हकहकूक के लिए कभी जुबान खोली है।

मीडिया का यह पाकंडी मसीहा तबका,सत्तावर्ग ही बाकी मीडियाकर्मियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं।क्योंकि वे बाकायदा मीडिया प्रबंधन के हिस्सा बने रहे हैं।इन लोगों से सावधान रहने की जरुरत है।कारपोरेट हितों के लिए वे हमेशा पेरोल पर हैं।

हमने अपनी पेशेवर पत्रकारिता के 36 सालों में अपने साथियों को बचाने की हर संभव कोशिशें की हैं।जरुरत पड़ी तो किसी किसी पर हाथ भी उठाया है,लेकिन ऐन मौके पर उनकी गलतियों की जिम्मेदारी लेकर सजा भुगतने में और अपने कैरियर का बंटाधार करने में भी हिचकने की जरुरत महसूस नहीं की है।

हमने किसी की शिकायत करने के बजाये हमेशा खुद हालात से निबटने की कोशिशें की हैं और जाहिर है कि मैनेजमेंट की आंखों में किरकिरी बने रहने में या उसे डराने में मुझे मजा आता रहा है।

हस्तक्षेप पर अरविंद घोष की रपट से सदमा जरुर लगा है,लेकिन हमारे लिए यह कोई अचरज की बात नहीं है।मीडिया में पेशेवर नौकरी में रहते हुए हमें बहुत कुछ झेलना पड़ा है।

एबीपी समूह शुरु से ही मुक्तबाजार व्यवस्था का सबसे मुखर प्रवक्ता रहा है और इस मायने में टाइम्स समूह उसका देश एकमात्र प्रतिद्वंद्वी है।

दुनियाभर में ट्रंप समर्थक अमेरिकी फाक्स न्यूज के साथ उसकी तुलना की जा सकती है जो वर्चस्ववादी नस्ली रंगभेद के सत्तावर्ग की संस्कृति का प्रचार प्रसार करता है।

टीवी 18 समूह और हिंदुस्तान समूह के रिलायंस के हवाले हो जाने के बाद मीडिया कर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी  भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी है।अरविंद ने लिखा हैः

Strongly condemn the retrenchment on 7th February, 2017 with only 2 hours notice, of about 750 workers, journalists and reporters of Ananda Bazar Patrika group of  newspapers of Kolkata. Express solidarity with the retrenched workers and journalists and their affected families.

यह हालत अचानक नहीं बनी है।

मीडियाकर्मियों की जनपक्षधर चरित्र के लगातार हो रहे स्खलन और उनके आत्मघाती तरीके से मार्केटिंग और सत्ता की पैदल सेना बन जाने से समूचा मीडिया इस वक्त बारुदी सुंरगों से भरी मौत की घाटी में तब्दील है।

गैरपत्रकार तबकों की छंटनी का कभी विरोध न करने वाले पत्रकार अब मीडिया में गैरपत्रकारों के सारे काम मसलन कंपोजिंग,प्रूफ रीडिंग,लेआउट,फोटोशाप,पेजमेकिंग से लेकर विज्ञापने लगाकर सीधे मशीन तक अखबार छापने के लिए तैयार करने का काम करते थे,जहां 1991 से पहले इन सारे कामों के लिए अलग अलग विभाग गैरपत्रकारों के थे।

आटोमेशन मुहिम के चलते एक एक करके वे सारे विभाग बंद होते चले गये।अखबारों में अब दो ही सेक्शन हैं,संपादकीय और प्रिंटिंग मशीन।

संपादकीय विभाग का काम भी मूल सेंटर के अलावा बाकी सैटेलाइट संस्करणों में इलेक्ट्रानिक इंजीनियर कर देते हैं।इसके खातिर पत्रकारों की संख्या बहुत तेजी से घटी है।प्रिंटिंग सेक्शन में भी बचे खुचे कर्मियों को अपने संस्थान के अखबारों के अलावा एक साध दर्जन भर से ज्यादा अखबारों का काम संस्था के जाब वर्क बतौर काम के घंटों के अंदर अपने वेतनमान के अलावा बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के करना होता है।

मीडिया संस्थानों में स्थाई नौकरी वाले पत्रकार गैर पत्रकार विलुप्त प्राय हैं।जो हैं वे रिटायर करने वाले ही हैं।उन्हें आगे एक्सटेंशन मिलने की कोई संभावना नहीं है।

अगले पांच सालों में मीडिया में सारे कर्मचारी ठेके की नौकरी पर होंगे।आटोमेशन के सौजन्य से किसीकी खास काबिलियत का कोई मूल्य नहीं है।इसलिए बाजार के मुताबिक छंटनी का यह सिलसिला चलने वाला है।

वेज बोर्ड से बचने के लिए देशभर में असंख्य संस्करण आटोमेशन के जरिये छापते रहने की वजह से मीडिया में कोई पत्रकार या गैरपत्रकार,चाहे उनकी काबिलियत या हैसियत कुछ भी हो,अपरिहार्य नहीं हैं,जैसे हम लोग 1991 से पहले हुआ करते थे।सिर्फ अपने काम और अपनी दक्षता के लिए उन दिनों पत्रकारों के सात खून माफ थे।

मीडिया ने मुझ जैसे बदतमीज पत्रकार को भी 36 साल तक झेल लिया और आजादी का सचस्का लग जाने से मैंने भी 36 साल तक मीडिया को झेला।अब हमारे जैसे लोगों के लिएमीडिया में कोई जगह नहीं बची है।

इसलिए मीडिया में हर छोटे बड़े पत्रकार गैरपत्रकार के सर पर छंटनी की तलवार लटकी हुई है।आंखें बंद करके कारपोरेट या मार्केट के हित में कमा करते रहने की वफादारी से भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है,जब प्रेतात्माों से मीडिया का काम चल सकता है,तो मनुष्यों को मीडिया की कोई जरुरत नहीं है।

हम जब दैनिक जागरण में मुख्य उपसंपादक बतौर काम कर रहे थे,1984 और 1989 के दौरान,तब माननीय नरेंद्र मोहन समूह के प्रधान संपादक थे।संपादकीय विभाग के कामकाज में वे हस्तक्षेप नहीं करते थे।

संस्करण मैं ही निकालता था।ऐसा वक्त भी आया कि रातोंरात सारे पत्रकार बाग निकले और डेस्क के साामने सबएडीटर की कुर्सी पर सिर्फ नरेंद्रमोहन जी अकेले थे।उस वक्त नये पत्रकारों की भरती का विज्ञापन सबसे पहले तैयार करना होता था और आवेदन मिलते न मिलते उन्हें नियुक्ति देकर ट्रेनी पत्रकार बतौर उन्हें काम के लायक बनाना होता था।

विज्ञापन छापने से लेकर भर्ती और प्रशिक्षण मेरठ में मेरी जिम्मेदारी थी तो कानपुर में आदरणीय बीके शर्मा की और समूह के समाचार संपादक तब हरिनारायण निगम थे।

मुश्किल यह था कि छह सौ रुपल्ली से ज्यादा छात्रवृत्ति किसी को दी नहीं जाती थी।यह मरेठ की पगार थी।लखनऊ में तीन सौ रुपये की छात्रवृत्ति थी।खुराफात की वजह से जब उन्हीं तीनसौ रुपये की पगार पर उन्हें मेरठ स्तानांतरित कर दिया जाता था,हमारे लिए मानवीय संकट खड़ा हो जाता था।

सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि नरेंद्र मोहन जी का आदेश था कि स्टिक बाई स्टिक मापकर पांच कालम का अनुवाद और पांच कालम के संपादन का काम सबसे लेना हो चाहे अखबार में कुल दस कालम की भी जगह न बची हो।

हम लगातार प्रशिक्षुओं को स्थाई बनाने पर जोर देते रहते थे और अक्सर ऐसा नहीं हो पाता था।काम सीखते ही एक साथ भर्ती तमाम प्रशिक्षु झुडं बनाकर कहीं भी किसी भी अखबार में भाग निकलते थे क्योंकि तब जागरण ट्रेनिंग सेंटर से निकले पत्रकारों की बाजार में भारी मांग होती थी ।स्थाई पत्रकार भी वेतन सात सौ आठ सौ रुपये से ज्यादा न होने की हालत में अक्सर निकल भागते थे।

फिर नये सिरे से भर्ती और प्रशिक्षण की कवायद।आदरणीय बीके शर्मा के बाद शायद मैने ही सबसे ज्यादा पत्रकारों को जागरण में नियुक्ति दी है और प्रशिक्षित किया है।इसलिए साथी पत्रकारों की नौकरी के आखिरी दिनों में भी मुझे बेहद परवाह होती थी।

प्रभात खबर,जागरण और अमरउजाला में हम कंप्यूटर पर बैठते नहीं थे।कंपोजीटर,प्रूफरीटर,पेजमेकर अलग थे।कैमरा और प्रोसिंसग के विभाग अलग थे।कोलकाता में आये तो लेआउट आर्टिस्टभी दर्जनभर से ज्यादा थे।

बीके पाल एवेन्यू में दोनों अखबारों में सौ से ज्यादा पत्रकार थे और लगभग सभी स्थाई थे।इनके अलावा जनसत्ता के करीब डेढ़ सौ स्ट्रींगर थे।दस साल पहले भी ग्रांट लेन के आफिस में इंडियन एक्सपेर्स की शुरुआत पर सौ से ज्याादा पत्रकार थे।फाइनेंशियल एक्सप्रेस का आटोमेशन सबसे पहले हुआ।फिर जनसत्ता का।

आटोमेशन ने सारी भीड़ छांट दी।

अब जनसत्ता कोलकाता में मेरे और शैलेंद्र के रिटायर होने के बाद स्थाई पत्रकार सिर्फ दो डा.मांधाता सिंह और जयनारायण प्रसाद रह गये तो एकमात्र स्टाफ रिपोर्टर प्रभाकरमणि तिवारी।बाकी दो अखबारों में एक भी स्थाई पत्रकार नहीं हैं।

आफिस और मार्केटिंग में सारे के सारे.मैनेजर भी सारे के सारे ठेके पर हैं।

दो आर्टिस्ट सुमितगुहा और विमान बचे हैं स्थाई।

कंपोजिग के पुराने साथियों में प्रमोद कुमार और संपादकीय सहयोगी महेंद्र राय स्थाई हैं जो मार्केटंगकेलिए काम करते हैं।

मशीन में पुराने कुछ लोगों के अलावा बाकी सारे ठेके पर हैं।

यह किस्सा हकीकत की जमीन पर कयामती फिजां की तस्वीर है।

एबीपी भाषाई अखबार समूह है ,जहां आटोमेशन शायद सबसे पहले शुरु हुआ।लेकिन बांग्ला में इंटरनेट से हिंदी और अंग्रेजी की तरह सारा कांटेट रेडीमेड लेने की स्थिति न होने और करीब पंद्रह करोड़ बांग्ला पाठकों की वजह से उन्हीं मौलिक कांटेंट की जरुरत पड़ती है।इसलिए आटोमेशन और ठेके की नौकरी के बावजूद वहां पत्रकारों गैरपत्रकारों की फौज बनी हुई थी।

यानी बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं के  मीडिया में भी  हिंदी और अंग्रेजी की तरह प्रेतात्माओं से अब काम लिया जाना है।

प्रेतात्माओं का वर्चस्व मनुष्यों के वजूद को खत्म करने वाला है।इंसानियत का जज्बा खतम है तो जाहिर है कि अब सिर्फ मसीने बोलेंगी।अभी रोबाट आया नहीं है और यह हाल है,आगे क्या होगा ,मीडियाकर्मी सोच समझ लें तो बेहतर।

जाहिर है कि आटोमेशन,मशीनीकरण,आधुनिकीकरण ,उपभोक्ता वाद और मुकतबाजार का पत्रकारों ने जिस अंधेपन से समर्थन किया है,उससे सत्तावर्ग और मुक्तबाजारी राजनीति के नरसंहारी अश्वमेधी अभियान में चुनिंदा मौकापरस्त पत्रकारों के राजनीति,सत्ता और यहां तक कि पूंजीवादी तबक में एडजस्ट होने की कीमत अब मीडियाकर्मियों को हर हालत में चुकानी होगी।

साथियों की निरंतर छंटनी का प्रतिरोध पत्रकार जमात ने  चूंकि कभी नहीं किया है और छंटनी का सिलसिला पत्रकारों के सहयोग से निर्विरोध जारी रहने की वजह से यूनियन बनाकर लड़ने की संख्या और ताकत भी उनके पास नहीं है।दूसरी तरफ श्रम कानून सिरे से खत्म हो जाने पर ऐसी लड़ाई से भी अब पायदा नहीं है।वेज बोर्ड का किस्सा काफी है प्रेस और मीडिया में कानून के राज का सच बताने के लिए।

हाल में भड़ास के मजीठिया मंच से कानूनी लड़ाई का एकमोर्चा जरुर खुला है लेकिन मीडिया में इस वक्त संपूर्ण आटोमेशन होने की वजह से वेतनमान की लड़ाई भले आप लड़ लें,तेज होती छंटनी रोकने का आसार बेहद कम है।

अब मीडियाकर्मियों को फर्जी मसीहा वर्ग की प्रेतात्माओं के शिकंजे से बाहर निकालकर अपनी जनमुखी भूमिका में वापस आने का सही वक्त है क्योंकि अब खोनेका कुछ भी नहीं है।हमने यह फैसला 1991 में ही कर लिया था।

सिर्फ तरक्की और प्रोमोशन के मौके के अलावा मैंने कुछ नहीं खोया है।अब रिटायर होने के बाद भी बाकायदा जिंदा हूं और अपने मोर्चे पर अडिग हूं।

जीवित मृत मसीहा संप्रदाय से मैरी स्थिति बेहतर है क्योंकि मैंने पाखंड जिया नहीं है और आम जनता के साथ सड़क पर खड़े होने में मुझे कोई शर्म नहीं है।मेरी नियति तो अपने पुरखों की तरह अपने गांव खेत खलिहान में किसी आपदा में मर जाने की थी।पढ़ लिखकर मैं अपने लोगों के साथ मजबूती के साथ खड़े होने की हिम्मत जुटा सका और पत्रकरिता को उनके हक हकूक की लड़ाई के हथियार बतौर इस्तेमाल करने की हमेशा कोशिश की, मरते वक्त कम स कम मुझे मामूली पत्रकार होने का अफसोस नहीं होगा।चाहे हासिल कुछ नहीं हुआ हो।

मेरे पत्रकार मित्रों,पानी सर से ऊपर है और पांव तले जमीन भी खिसक रही है।बतौर पत्रकार जनता के साथ खड़े होने का इससे बेहतर मौका नहीं है।


Friday, February 17, 2017

जोहार! झारखंड में जल जंगल जमीन की लड़ाई आर या पार! टाटा देखाया, एचईसी देखाया / सीसीएल देखाया, ईसीएल देखाया बोकारो देखाया, रउरकेला देखाया / किसी ने देखा क्या ‘बिकास’? ग्लोबल समिट का मदारी लोग भी ऐसा ही झूठ्ठा है. ओह रे रीझरंगिया, हाय रे झारखंडिया ! आए गेलक लूटेक ले सरकार-फिरंगिया !! पलाश विश्वास

जोहार! झारखंड में जल जंगल जमीन की लड़ाई आर या पार!

टाटा देखाया, एचईसी देखाया / सीसीएल देखाया, ईसीएल देखाया

बोकारो देखाया, रउरकेला देखाया / किसी ने देखा क्या 'बिकास'?

ग्लोबल समिट का मदारी लोग भी ऐसा ही झूठ्ठा है.

ओह रे रीझरंगिया, हाय रे झारखंडिया !

आए गेलक लूटेक ले सरकार-फिरंगिया !!

पलाश विश्वास

रांची से ग्लाडसन डुंगडुंग ने लिखा हैः

क्या केंद्र सरकार कोई निजी कंपनी है जो झारखण्ड में निवेश करेगी या झारखण्ड और भारत अलग-अलग देश है? केंद्र सरकार राज्यों को आर्थिक सहायता देती है पूंजीनिवेश नही करती है तथा एक देश ही दूसरे देश में पूंजी निवेश करती है। लेकिन अब क्या केंद्र सरकार को झारखण्ड से लाभ कमान है? क्या बात है! असल में कोई कंपनी राज्य में 5 हजार करोड़ से ज्यादा निवेश करने को तैयार ही नही है इसलिए फजीहत होने से बचने के लिए केंद्र सरकार ही कंपनी बन गयी और 50 हज़ार करोड़ निवेश करने की घोषणा की है। लेकिन सवाल यह है कि जब केंद्र सरकार ही सबसे बड़ा निवेशक है तो ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट आयोजित करने की क्या जरूरत थी? मुख्यमंत्री का फोटो छापकर दिखाने के लिए सरकारी खजाना खाली क्यों किया गया? कोई तो कुछ बताओ भाई क्या चल रहा है?

एके पंकज ने लिखा हैः

टाटा देखाया, एचईसी देखाया / सीसीएल देखाया, ईसीएल देखाया

बोकारो देखाया, रउरकेला देखाया / किसी ने देखा क्या 'बिकास'?

ओह रे रीझरंगिया, हाय रे झारखंडिया !

आए गेलक लूटेक ले सरकार-फिरंगिया !!

ग्लोबल समिट का मदारी लोग भी ऐसा ही झूठ्ठा है.

आम सूचना ----------------------

यह आम सूचना झारखंड का गोटा पबलिक लोग का तरफ से जारी किया जाता है कि 16 और 17 फरवरी को 'मोमेंटम झारखंड-ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट 2017' का नाम से हो रहा सरकारी लूट का खिलाफ आप सब अपना फेसबुक वॉल को ऐसा हरा कर दो. वरचुअल बिरोध भी हमारा लड़ाई का जंगल-मैदान है.

दयामणि बारला का कहना हैः

गैर मजरूआ आम, गैर मजरूआ खास जमीन सरकार का नहीं है, यह आदिवासी, मूलवासियों , किसानों और मेहनत कशों का है- जान देंगे-जमीन नहीं।

कोल्हान के मनकी-मुङांओं ने कहा -किसी भी कीमत में हम अपना जंगल जमीन नदी पहाड़ से विस्थापित नहीं होना चाहते-

इन दिनों में मेरे पांव थमे हुए हैं।उंगलियां अभी सही सलामत हैं।आंखों में भी  रोशनी बाकी है।मैंने झारखंड में जल जंगल जमीन की लड़ाई में शामिल होने की गरज से कभी 1980 में पत्रकारिता की तब शुरुआत की थी,जब छत्तीसगढ़,उत्तराखंड के साथ साथ झारखंड में जल जंगल जमीन की लड़ाई तेज थी।

छत्तीसगढ़ में शंकरगुहा नियोगी संघर्ष और निर्माण राजनीति के तहत छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे तो उत्तराखंड में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी आंदोलन कर ही थी,जिस आंदोलन की बागडोर अस्सी के दशक से अब तक उत्तरा खंड की महिलाओं ने संभाल रखी है।

उस वक्त आंदोलन की कमान शिबू सोरेन और विनोद बिहारी महतो के साथ साथ मजदूर आंदोलन के नेता कामरेड एके राय संभाल रहे थे।

अब मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़,यूपी से टूटकर उत्तराखंड और बिहार के बंटवारे के बाद झारखंड अलग राज्य बन गये हैं और तीनों राज्यों में आंदोलनकारी अलग अलग खेमे में बxट गये तो जल जंगल जमीन की लड़ाई हाशिये पर आ गयी है।

मुक्तबाजार में बाजार के कार्निवाल में उत्सव संस्कृति सुनामी की तरह देशभर में आम जनता की रोजमर्रे की जिंदगी को तहस नहस कर रही है और विकास के नाम पूंजी निवेश के बहाने जल जंगल जमन से बेदखली का अंतहीन सिलसिला शुरु हुआ है।

इस बेदखली के खिलाफ देशभर में आदिवासी हजारों साल से लगातार लड़ रहे हैं और संसाधनों पर कब्जे के लिए उनका नरसंहार  ही भारत का सही इतिहास है जिसकी शुरुआत मोहनजोदोड़ों और हड़प्पा की सभ्याताओं के विनाश से हुई।सिंधु घाटी की नगरसभ्यता के वास्तुकारों,निवासियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी हार नहीं मानी है और वैदिकी सभ्यता के खिलाफ जल जगंल जमीन पर उनकी लड़ाई भारत का इतिहास है।

1757 में पलाशी की लड़ाइ में सिराजुदौल्ला की हार के बाद बंगाल और बिहार समेत पूरे पूर्व और मध्य भारत में,पश्चिम भारत में भी देश के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए आदिवासी अंग्रेजी हुकूमत और देशी हुक्मरान के खिलाफ लड़ते रहे हैं।

आजादी के बाद विकास के नाम पर इन्ही आदिवासियों की लगातार बेधखली होती रही।भारत विभाजन के बाद जितने शरणार्थी पाकिस्तान, बांग्लादेश, तिब्बत, म्यांमार और श्रीलंका से आये उनसे कहीं ज्यादा संख्या में इस देस में आदिवासी जबरन विस्थापित बनाये गये हैं।

इसी लूटखसोट नीलामी के मकसद से भारतीय सेना और अर्द्ध सुरक्षा बल देशी विदेशी कंपनियों की सुरक्षा के लिए आदिवासी भूगोल के चप्पे चप्पे में तैनात हैं।अपने विस्थापन का विरोध और जल जंगल जमीन का हकहकूक की आवाज बुलंद करने पर तमाम आदिवासी नक्सली और मार्क्सवादी करार दिये जाते रहे हैं और उनके दमन के लिए सलवा जुड़ुम से लेकर सैन्य अभियान तक को बाकी देश जायज मानता रहा है।

1991 के बाद अबाध पूंजी प्रवाह और निवेश विनिवेश आर्थिक सुधार के बहाने पूरे देश में आदिवासियों के खिलाफ फिर अश्वमेध जारी है।जिसके केंद्र में झारखंड और छत्तीसगढ़ खास तौर पर है,जहां छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और झारखंड आंदोलन का विखंडन हो गया है।

खासतौर पर झारखंड आंदोलन की विरासत पर जिनका दावा है,झारखंड के वे आदिवासी नेता केंद्र और राज्य सरकारों में सत्ता में भागेदारी के तहत इस लूटपाट में शामिल हैं।

खनिज संपदा,वन संपदा और जल संपदा से हरे भरे छत्तीसगढ़ और झारखंड के आदिवासी फटेहाल हैं।जल जंगल जमीन की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले संथाल, मुंडा,भील,हो कुड़मी आदिवासियों के संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियों के तहत आरक्षित सुरक्षा कवच का भी कोई लाभ आजतक नहीं मिला है और न आजादी के बाद अबतक हुए तमाम विकास कार्यों में बेदखल आदिवासियों को कोई मुआवजा मिला है।

मुक्तबाजार में पूरा आदिवासी भूगोल एक अंतहीन वधस्थल है।

दूसरी ओर,जल जंगलजमीन की लड़ाई लड़ रहे उत्तराखंड में भी नया राज्य बनने के बाद माफिया राज है।

झारखंड के आदिवासी लगातार जल जंगल जमीन के हकहकूक के लिए लड़ रहे हैं।लेकिन बाकी जनता उनके साथ नहीं है और न मीडिया उनके साथ हैं।

छत्तीसगढ़ में सलवा जुड़ुम है तो झारखंड में वैज्ञानिक सलवा जुड़ुम है,जिसे मीडिया जायज बताने से अघाता नहीं है।

पूंजी निवेश के नाम अब मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में आईपीएल की तर्ज पर राष्ट्र और राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधनों की खुली नीमामी हो रही है।

देश में फासिज्म के राजकाज का अंदाजा लगाना आदिवासियों की रोजमर्रे की जिंदगी में सत्ता का बेलगाम आपराधिक वारदातों के बारे में जानकारी न होने की वजह से बेहद मुश्किल है।

मसलन नोटबंदी का असर आदिवासी इलाकों में सबसे ज्यादा है जो वन उपज पर जीविका निर्वाह करते हैं या आदिवासी इलाकों में सस्ते मजदूर के बतौर  मामूली आय से जिंदगी गुजर बसर करते हैं और जहां बंगाल की भूखमरी अभी जारी है।

आदिवासी कार्ड से लेनदेन नहीं करते हैं।जल जंगल जमीन से बेदखली के बाद वे रोजगार और आजीविका से भी बेदखल हैं।

आदिवासी इलाकों में न संविधान लागू है और न कानून का राज है।

वहां पीड़ितों की न सुनवाई होती है और न उनके खिलाफ आपराधिक वारदातों,दमन,उत्पीड़न का कोई एफआईआर दर्ज होता है।

नकदी संकट ने उन पर सबसे ज्यादा कहर बरपाया है।

इसके उलट संघ के खासमखास सिपाहसालार सीना ठोंककर विधानसभा चुनावों को नोटबंदी पर जनादेश बताने से परहेज नहीं कर रहे हैं क्योंकि गैरआदिवासी जनता कभी जल जंगल जमीन की लड़ाई में कहीं शामिल नहीं है और वहां मजहबी सियासत की वजह से अंध राष्ट्रवाद का असर इतना घना है कि किसी को काटों तो खून भी नहीं निकलेगा।

नकदी संकट को जायज बताकर वोट डालने वाले यूपी,पंजाब और उत्तराखंड में वोटर कम नहीं हैं।

हिंदुत्व का यह एजंडा कितनी वैदिकी रंगभेदी हिसा है और कितना राष्ट्रविरोधी कारपोरेट एजंडा,आदिवासियों की लड़ाई में शामिल हुए बिना इसका अहसास हो पाना भी असंभव है।

गौरतलब है कि बाबासाहेब भीमराव आम तौर पर वंचित वर्ग की लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन वे खुले तौर पर दलितों के नेता थे,जिन्हें खुलकर संविधान सभा में सबसे पहले आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा ने समर्थन दिया था।

सोशल इंजीनियरिंग और जाति धर्म समीकरण से सत्ता में भागेदारी में शरीक बहुजन समाज के नेताओं ने आदिवासियों के हक हकूक के लिए कोई आवाज अभी तक नहीं उठायी है और बहुजनों में हजारों साल से वैजिकी संस्कृति,पूंजी और साम्राज्यवाद के खिलाफ आजादी की लड़ाई में सबसे ज्यादा शहादतें देने वाले आदिवासियों के बिना बहुजन समाज का हर दावा खोखला है।

बहरहाल झारखंड और छत्तीसगढ़ में बहुजन आदिवासियों का साथ दें तो किसी चुनावी जीत के मुकाबले कही ज्यादा कारगर प्रतिरोध मुक्ताबाजार के हिंदुत्व एजंडे का हो सकता है।

इसी सिलसिले में रांची में ग्वलोबल इंवेस्टर्स समिट का विरोध कर रहे आदिवासियों का साथ देना बेहद जरुरी है।

डुंगडुंगने जो लिखा है,वह पूरे देश में मुक्तबाजारी लूटपाट का किसा है,जिसमें सत्तावर्ग के साथ साथ समारा मीडिया और सारी राज्य सरकारें शामिल हैं।

हम रांची जाने की हालत में नहीं हैं लेकिन हम रांची में आदिवासियों की इस लड़ाई के साथ हैं।

रांची से साथियों के कुछ अपडेट्स पर गौर करेंः

वंदना टेटे का कहना हैः

आदिवासी बोलेंगे| जहां भी मंच मिलेगा| अपनी ही बात बोलेंगे|

ग्लोबल समिट के जरिए हमारी आवाज नहीं दबायी जा सकती|

डुंगडुंग ने लिखा हैः

यह आॅकड़ा विकास बनाम विनाश को समझने के लिए है। विकास के नाम पर उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सौदा करने का नतीजा क्या हो सकता है उसे समझना हमारे लिए बहुत जरूरी है। चीन की अर्थव्यवस्था 9.24 ट्रिलियन डाॅलर है और भारत का 1.877 ट्रिलियन डाॅलर। चीन के घरेलू सकल उत्पाद के मूल्य का विश्व अर्थव्यवस्था में हिस्सा 17.75 प्रतिशत है जबकि भारत का मात्र 3.38 प्रतिशत है। चीन में प्रति व्यक्ति आय 6,807.43 डाॅलर है वहीं भारत में प्रति व्यक्ति आय 1,498.87 डाॅलर। लेकिन चीन के 74 शहरों में से सिर्फ 3 शहर ही पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित हैं एवं बाकी 71 शहरों में आॅक्सीजन खरीदना पड़ रहा है। भारत की राजधानी दिल्ली पर्यावरण की दृष्टि से असुरक्षित हो चुकी है जहां कनाडा की कंपनी ने आॅक्सीजन बेचने का प्रस्ताव रखा है। एक बार सांस लेने के लिए 12.50 रूपये चुकाना होगा। लेकिन भारत चीन से प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है। इसलिए आज यह समझना बहुत जरूरी है कि हम आदिवासी लोग जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज यानी प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं तो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि यह संघर्ष सम्पूर्ण मानव जीवन और प्रकृति को बचाने के लिए है। आज जंगल सिर्फ आदिवासी इलाकों में क्यों बचा हुआ है? क्या विकास का बड़ा-बड़ा सिद्धांत देने वालों के पास इसका जवाब है?

बरखा लकडा ने लिखा हैः

इतिहास आपकी ताकत है, तो युवा आपकी शक्ति 🍂

🍂वीरता की ढाल पहनकर व जुनून का हथियार लेकर अमर नहीं शहीद होने का जज्बा रखो🍂

अपने हजारों साल के लंबे और वैविध्यपूर्ण इतिहास में आदिवासी आज सबसे ज्यादा नाजुक दौर से गुजर रहा हैं। इस लम्बे इतिहास में हमारे पुरखों ने हर तरह के बाहरी आवरणों , आक्रमणों और भेदभाव को पूर्ण हस्तक्षेप कर सफलता पूर्वक संर्घष किया। हाथ में तीर-कमान , टंगियाॅ , दौवली लेकर दुश्मनों का कड़ा मुकाबला किया। अपनी संस्कृति, आज़ादी और अस्मिता की रक्षा के लिए खुद की बलि चढा दी। अंग्रेजों के हमलें के बाद आदिवासी इलाकों का इतिहास उनकी घुसपैठ को नाकाम करने के लिए प्रतिकारों और विद्रोहों की न टूटने वाली कड़ी रूप गाथाओं की अंतहीन किताब हैं। हमें अभिमान है कि गाथाओं में झारखंड में आदिवासी प्रतिकारों और विद्रोहों की गथाऐं अनूठी हैं। और सुनहरे अक्षरों में अंकित हैं। ये स्पष्ट है कि आदिवासी समाज ने कभी अंग्रेज़ी हूकुमत को स्वीकारा ही नहीं । उस समय दो ताकत 'आदिवासी बनाम अंग्रेज़ी हूकुमत' की लडाई हुई। इस लड़ाई में सारे आदिवासी युवा ही नेतृत्‍व किये।

आदिवासियों का मानना था कि 'हमारे पुर्वजों ने जंगल- पहाड़ काटकर अपने हाथों से इस धरती को रहने लायक बनाया ये धरती हमारे पूर्वजों की हैं बीच में ये सरकार कहाॅ से आयी'।

वर्त्तमान समय में भी सरकार छलपूर्ण कूटनीतिक चालों से विकास के नाम पर आदिवासियों की जमीन हडप लेना चाहती हैं। इस आक्रमण का खुला चुनौती सिर्फ और सिर्फ युवा ही दे सकते हैं। आज भी लडाई ' आदिवासी बनाम सरकार ' की हो गई हैं। जिसका सीधा मुकाबला युवा ही कर सकते हैं। इन युवाओ को भी अपने पुर्वजों के इतिहास को अपनी ताकत बनाकर सरकार की धूर्तापूर्ण कूटनीतिक और छलपूर्ण नीतियों का डटकर सामना करना होगा। फिर एक नयी 'हूल उलगुलान' का विगूल फूकना होगा वरना सरकार आपको विकास के नाम पर कब बलि चढा देगी ये खुद को भी पता नहीं चलेगा। अब वक्त है साथियों वीरता की ढाल पहनकर व जुनून का हथियार लेकर अमर नहीं शहीद होने का जज्बा रखो तभी आप अपना भूत, वर्त्तमान और भविष्य बचा पाओगे। और आपका आने वाला पीढी आपको नमन करेगा।

अब तो लौट आओ बिरसा..

अब तो लौट आओ बिरसा॥

सूख गयी सारी नदियाँ बिरसा, कट गये सारे पेड़॥॥

सूना हुआ पहाड़ बिरसा ,

जंगल हुआ विरान॥

कत्ल हो गये सारे सपने बिरसा,

यतीम हुआ इतिहास ॥॥

जल रही है धरती बिरसा ,

लूट रहा आकाश॥॥

पुकार रही है आंसू बिरसा, चीख रहा आवाज॥॥

अब तो लौट आओ बिरसा

अब तो लौट आओ...

🍂बरखा लकडा 🍂


डुंगडुंग ने लिखा हैः

आदिवासियों को एक बात बहुत अच्छा से समझना होगा कि यदि वे ऐसे ही दूसरों के इसारे पर नाचते और उद्योगपतियों का स्वागत करते रहे तो आनेवाले समय में उनके पास नाचना क्या पैर रखने के लिए भी जमीन नही होगा। और जब जमीन ही नही होगा तो उनको कोई पूछने वाला भी नही होगा। आदिवासी लोग कीड़े-मकोड़े की तरह रौंद दिए जायेंगे। जमीन, इलाका और प्राकृतिक संसाधन पर ही आदिवासी अस्तित्व टिक हुआ है। जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज ख़त्म मतलब आदिवासी ख़त्म।

मोमेंटम झारखंड। आपका क्या है जो इतना इतना रहे हैं? जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज यानी सम्पूर्ण प्राकृतिक संम्पदा आदिवासियों का। उन्हीं के इलाकों में। आपके इलाके में क्या है? आप ने सबकुछ बेच खाया है। हां इन संसाधनों को आप लूट जरूर सकते हैं आदिवासियों से। आप हैं ही चोर, लूटेरा, बेईमान, हत्यारा और मुनाफाखोर। अब देखिये मोमेंटम झारखंड का लोगो उड़ता हाथी भी आपने गांेड़ आदिवासियों की कलाकृति से चोरी करके 40 लाख रूपये में बेचा है और आदिवासियों को क्रेडिट तक नहीं दिया। इतना बेईमान हैं आप लोग जो आज विकास के ठेकेदार बने हुए हैं और मीडिया तो आपके प्रचार का माध्यम है। पांच पेज का सरकारी विज्ञापन एक दिन में। वाह रे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ! सच्चाई छुपाने और जनता को भ्रमित करने का इनाम। अपना वजूद तक खोने को तैयार। जय हो लोकतंत्र ! चोर, लुटेरा, बेईमान, हत्यारा और मुनाफाखोरों का महाकुंभ है 'मोमेंटम झारखंड' और पानी की तरह पैसा बह रहा आम जनता का। और हां जब मैं हत्यारा कह रहा हॅंू तो याद रखिये टाटा ने ओड़िसा के कलिंगानगर में 19 आदिवासियों की हत्या करने के बाद अपना परियोजना स्थापित किया है और यही हत्यारा देश के विकास का मॉडल है तो आप समझ सकते हैं कि झारखंड किस दिशा में जा रहा है।

छापिए-छापिए. अपनी वॉल पर. उसकी वॉल पर. दोस्त की वॉल पर. दुश्मन की

वॉल पर. हर वॉल पर छापिए. कल तक सबकी वॉल पर छपा होना चाहिए -

''हेंदे रमड़ा केचे केचे, पुंडी रमड़ा केचे.''


इसके उलट सरकारी दावा हैः

संपन्न हुआ निवेशकों का महाकुंभ : हो जाये तैयार....आने वाला है छह लाख रोजगार :

तैयार हो जाइये क्योंकि आने वाले दो सालो में झारखंड के छह लाख से ज्यादा लोगो को रोजगार मिलेगा. विभिन्न सेक्टर्स में छह लाख से अधिक लोगो के लिए रोजगार के द्वार खुलेंगे. जी हां, ये कोई सपना नहीं बल्कि हकीकत है. आज मोमेंटम झारखंड के दौरान 3 लाख करोड़ के निवेश पर हस्ताक्षर हुए. 209 कंपनियों के साथ सरकार का एमओयू हुआ. वहीं 6 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा. प्रत्यक्ष और परोक्ष मिला कर वास्तविक रोजगार की संभावनाएं इससे कई गुणा अधिक होगी. राज्य सरकार की ओर से कंपनियों के सीएसआर फंड पर नजर रखने के लिए भी एक संस्था का गठन किया गया है जिसकी जिम्मेदारी अब और ज्यादा बढ़ गई है.

बढे़गा जीवन स्तर :

मोमेंटम झारखंड से सूबे के लोगों के एसइएस यानि सोशियो इकोनोमिक स्टेटस में भी बेहतरी के अवसर खुलेंगे. नियमानुसार कंपनियों को अपने लाभ का दो प्रतिशत कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी पर खर्च करना होता है. जाहिर है सूबे के जिस इलाके में कंपनियां निवेश करेंगी, वहां स्कूल, पार्क, स्वास्थ्य व अन्य जन सुविधाओं में इजाफा होगा. कंपनियों ने भी आयोजन के दौरान इसमें अपनी रुचि दिखाई जिससे उम्मीद जाहिर हो रही है कि इलाके का जीवन स्तर सुधरेगा.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट :

अथर्शास्त्री प्रो हरेश्वर दयाल कहते हैं कि मोमेंटम झारखंड से जीवनस्तर और जनसुविधाओं के बढ़ने की कई राह खुली हैं. एक तो यहां निवेश से रोजगार के अवसर खुलेंगे. दूसरा सीएसआर यानि कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी से भी इलाके की जनसुविधाएं बढ़ेंगी. वहीं दूसरी ओर रैपिड ट्रांसपेार्ट और स्मार्ट सिटी विकसित होने से लोगों को सीधा लाभ मिलेगा और उनके जीवनस्तर में सुधार होगा.

दिखाया सामाजिक जिम्मेदारी के लिए उत्साह :

कंपनियों ने अपने संबोधन में यहां की सामाजिक जिम्मेदारी में हिस्सेदारी की बात भी कही. जिंदल ग्रुप के नवीन जिंदल ने एलान किया कि सीएसआर के तहत कंपनी स्कूल और स्किल डेवलपमेंट में काम करेगी. सिंगापुर आम लोगों को सस्ते आवास मुहैया कराने में के प्रयास में राज्य सरकार का साझीदार बनेगा. मोमेंटम झारखंड के पहले दिन जॉन अब्राहम के नेतृत्व में सीएम से मिले प्रतिनिधिमंडल ने इस बाबत चर्च की. इसके अलावा सिंगापुर ने अस्पताल, कन्वेंशन सेंटर के निर्माण में भी रुचि दिखाई. आस्ट्रेलिया ने राज्य के बच्चों को स्कूली स्तर पर भी ट्रेनिंग देकर ओलंपिक के लिए तैयार करने की बात कही. किसानों को अधिक उपज के लिए ट्रेनिंग देने, सखी मंडल, युवा मंडल के कौशल विकास में भी आस्ट्रेलिया मदद करेगा.


Thursday, February 16, 2017

क्रांति की यादें: स्मारकीय विचारधारा से परे





अक्तूबर क्रांति की सौवीं सालगिरह के मौके पर क्रांतियों द्वारा विकसित किए जाने वाले नजरिए और क्रांति को देखने के नजरिए के बारे में सौम्यव्रत चौधरी और रेयाजुल हक का लेख. 
 

1789 में फ्रांस की क्रांति की शुरुआत में ही दो बातें सामने आती हैं. पहली बात: हर क्रांतिकारी कदम और घटना मानो एक सामूहिक इच्छा को जन्म देती है, कि ऐसा हर कदम और घटना एक राष्ट्रीय स्मारक का विषय बने. स्मारक ही नहीं; हर क्रांतिकारी तारीख एक सामूहिक उत्सव के रूप में मनाई जाए. इस तरह फ्रांसीसी क्रांति, क्रांतिकारी भावनाओं के साथ-साथ, कुछ खास नाटकीय भावना भी पैदा करना चाहती है. ये वे भावनाएं हैं जिनसे एक दर्शक समूह किसी रंगमंच पर नाट्य प्रदर्शन के दौरान गुजरता है. या फिर एक समूह इन घटनाओं में इस तरह हिस्सा लेता है, जैसे किसी उत्सव में हिस्सा ले रहा हो. दोनों सूरतों में क्रांतिकारी दौर, मानो अपने आपको उस ऐतिहासिक पल की सच्चाई से आगे बढ़ कर एक कलात्मक और हमेशा कायम रहने वाली एक सच्चाई, एक शाश्वत सत्य का दर्जा देना चाहता है.
 

दूसरी बात: 1789 से 1794 के बीच फ्रांसीसी क्रांति यह बात भी जाहिर करती है कि फ्रांस के क्रांतिकारी जो कर रहे थे, बोल रहे थे, जिन व्यापक गतिविधियों में हिस्सा ले रहे थे, वो सारी गतिविधियां मानो इतिहास के रंगमंच पर रचा जाने वाला प्रदर्शन यानी परफॉरमेंस हों. फर्क सिर्फ इतना था कि इतिहास के रंगमंच पर खेला गया नाटक किसी बाहरी दर्शक-समूह के लिए नहीं होता है. ऐसे रंगमंच में दर्शक खुद इतिहास के अभिनेता होते हैं, या कम से कम बन सकते हैं. इस संदर्भ में एमानुएल कांट द्वारा 1794 में कॉन्टेक्स्ट ऑफ फैकल्टी  में कही गई बात याद आती है कि अगर फ्रांसीसी क्रांति के विषय पर कोई ऐसा दर्शक सोचें या उसकी कल्पना करें जो इतिहास की परिधि से बाहर हो, जो खुद ही एक काल्पनिक दर्शक हो, तो ऐसे दर्शक में फ्रांस की क्रांति के संबंध में एक खास भावना पैदा होगी. इस भावना को कांट ने एंथुसियाज्म  यानी उत्साह का नाम दिया. इस भावना को हम नाट्यशास्त्र के नजरिए से एक 'राजनैतिक रस' कह सकते हैं. हालांकि याद रखना जरूरी है कि कांट की राय में फ्रांसीसी क्रांति में जो असली अभिनेता या दर्शक थे, जो उस हकीकत का हिस्सा थे, उनके नज़रिए से क्रांति की घटनाएं इतनी उलझी हुई थीं और भावनाएं भी उतनी ही उलझी हुई होंगी कि उनका बस चले तो उस क्रांति की पटकथा को, उसके मौलिक रूप में इतिहास के रंगमंच पर शायद दूसरी बार न खेलें. कांट के मुताबिक इसकी वजह यह थी कि यह क्रांति इतने खून-खराबे वाली थी, और क्रांति के भागीदारों की चाहतों और सामने आने वाली असलियत के बीच बड़ा अंतर और यहाँ तक कि विरोध भी था. इसलिए कांट सोचते हैं कि क्रांति में भागीदार बने लोग इतिहास के उसी बिंदु पर पहुंच कर उसे नहीं दोहराएंगे. हालांकि इस क्रांति में भाग लेने से उनकी कल्पना में, उनकी सोच में जो भावना पैदा हुई, उसको कांट ने उत्साह के रूप में पहचाना. यह उत्साह, एक आदर्श बना रहा – क्रांति का आदर्श. भले ही उसे एक ऐतिहासिक परिघटना के रूप में दोहराने लायक नहीं माना जाए, लेकिन वह आगे बढ़ने की एक निशानी जरूर थी, जो इंसानी सभ्यता का एक लक्षण है.
 

इसके बावजूद, फ्रांस की क्रांति उसी उलझे इतिहास में क्रांतिकारी सोच – आज़ादी, बराबरी और मैत्री[1]  – को सामने लाती है, उसे अभिव्यक्त करती है. उसे साकार (परफॉर्म) करती है. यही फ्रांसीसी क्रांति की असली घटना (इवेन्ट) है.

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1917 में रूसी क्रांति के बाद, 1920 में अक्तूबर के महीने में रंगमंच के प्रसिद्ध निर्देशक निकोलाई एवरेइनोव ने एक विशाल स्मारक-प्रदर्शन का निर्देशन किया. 1917 की घटनाओं को तीन साल बाद 1918 में सेंट पीटर्सबर्ग में जार के राजमहल की सीढ़ियों पर एक नाटक के रूप में लाखों दर्शकों के बीच खेला गया. दर्शक यह प्रदर्शन देख भी रहे थे, उसमें हिस्सा भी ले रहे थे, जैसे तीन साल पहले रूस की जनता ने क्रांति में हिस्सा लिया था. 


फ्रांसीसी क्रांति से जुड़ी जो चाहत थी, वह रूस में भी नज़र आती है कि इतिहास की भौतिक असलियत को न छोड़ते हुए, इतिहास को एक नाटक की पटकथा, एक नाट्य-प्रदर्शन, एक नाट्य-उत्सव, एक नाट्य-रस की तरह आत्मसात किया जाए. लेकिन यह प्रयोग फ्रांसीसी क्रांति से इस मायने में अलग हो जाता है कि यहां जो हो चुका है और जो हो रहा है, उन दोनों को ही एक स्मारक के रूप में तब्दील कर देने की कोशिश हो रही थी. सोवियत संघ में असलियत से कल्पना तक का सफर तय किया जा रहा था, जहां चाहत और असलियत में फर्क तो था, लेकिन इस फर्क को स्मारकीय उत्सवों के जरिए महत्वहीन बनाने की कोशिश भी हो रही थी. 

इस रूसी अनुभव के परिप्रेक्ष्य में कुछ सवाल पैदा होते हैं – (i) क्या कोई राज्य (स्टेट) इस सामूहिक चाहत को पूरी तरह आकार दे सकता है? राज्य की अपनी संरचना, समूह/समाज की चाहत और एक राष्ट्रीय समूह/समाज की कल्पना में किस तरह का तालमेल बैठ सकता है कि घटनाओं की असलियत एक हवाई सपने में तब्दील न हो जाए? (ii) और जब राज्य की संरचना किसी दल (पार्टी) या संघ की संरचना से जुड़ जाए, और जब दोनों, समूह की चाहत और राष्ट्र की कल्पना का एकमात्र माध्यम बन जाएं, तो क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता है कि राज्य-पार्टी/संघ की संरचना ने क्रांतिकारी सोच को एक राज्य/पार्टी की विचारधारा बना दिया है?
 

रूस की बोल्शेविक पार्टी जिस वैचारिक दृष्टि को स्वीकार करती थी, उसके तहत राज्य यथास्थिति का एक उपकरण था, जो सिद्धांतत: परिवर्तन की सामूहिक चाहत का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था. इस अर्थ में क्रांतिकारी सोवियत राज्य की अवधारणा अपने आप में एक विरोधाभास महसूस होगी. लेकिन क्रांति के फौरन बाद क्रांति से असहमत, उसके विरोधी और प्रतिक्रांतिकारी – हर तरह की ताकतों से जनता और क्रांतिकारी ताकतों की रक्षा करने की उम्मीद और समाज के विकास को गति देने की चाहत एक वाजिब चाहत थी और इसे नकारा नहीं जा सकता. इस तरह क्रांति के बाद के सोवियत समाज में राज्य एक जमीनी हकीकत का हिस्सा था.
 

इस संदर्भ में यह बात साफ करना जरूरी है कि एक क्रांतिकारी पार्टी के रूप में बोल्शेविक पार्टी ने इतिहास की भौतिकता और असलियत, उसके द्वंद्व में हिस्सा लिया और उस उलझी हुई असलियत को एक क्रांतिकारी दिशा (orientation) देने की व्यावहारिक और सैद्धांतिक कोशिश की। यह क्रांतिकारी सोच को ही एक भौतिक (material) और आत्मिक (subjective) आयाम प्रदान करने की कोशिश थी. द्वंद्वात्मक स्थिति में दिशा (orientation) और विमर्श तलाशने की कोशिश, द्वंद्व को हवाई सपनों और शब्दों में तब्दील करना नहीं है–जैसा रूस की क्रांति के बाद राजकीय बोल्शेविक विचारधारा (बोल्शेविक स्टेट आइडयोलॉजी) ने एक समय में करना शुरू कर दिया था. 
 

जैसा कि ऊपर रेखांकित किया गया है, यह भूलना भी गलत होगा कि राज्य एक ऐसी संचरना है, जिसका क्रांतिकारी जनता प्रतिक्रांति के खतरे का सामना करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती है. एकदलीय राज्य ने शुरू में जो वादा किया, जनता ने उसका भरोसा किया, क्योंकि क्रांतिकारी घटना द्वंद्व का अंत नहीं है, उसका एक नया पड़ाव है, जहां नई दिशा की जरूरत है. पर यह सच है कि दलगत-राज्य (पार्टी स्टेट) प्रतिक्रांतिकारी शक्ल भी अख्तियार करता है. इस दुविधा या उलझन का हल क्या है?

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फ्रांस की इतिहासकार सोफी वाहनिक ने अपनी किताब इन डिफेन्स ऑफ द टेरर: लिबर्टी ऑर डेथ इन द फ्रेंच रिवॉल्यूशन  में यह दावा पेश किया है कि 1793-94 के क्रांतिकारी फ्रांसीसी दौर में राज्य ने अगर दहशत की नीति अपनाई तो इसका आधार यह था कि क्रांतिकारी जोश और प्रतिक्रांतिकारी खतरे का द्वंद्व, भावनाओं और हिंसा की एक पुनरावृत्ति में न फंसा रह जाए, वह 'विध्वंस के उन्माद' में फंसकर कत्लेआम में न लग जाए, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण की ओर बढ़े, जो प्रतिशोध की मांग कर रहे क्रांतिकारी जोश को शांत करने की भूमिका अदा करे. इस प्रक्रिया का अध्ययन करते हुए वाहनिक यह पाती हैं कि 1793-94 की नाज़ुक परिस्थिति में फ्रांस के क्रांतिकारी राज्य ने, जो क्रांतिकारी होने के साथ-साथ कमज़ोर भी था, दहशत की नीति अपनाई तो इसके पीछे उसका यह विश्वास था कि इससे सामने आनेवाली असलियत ऐसी होगी, कि उसकी वजह से प्रतिक्रांतिकारी दहशत से कांपेंगे और क्रांतिकारी सोच का सैद्धांतिक जुनून और व्यावहारिक संस्थाएं, प्रतिक्रांति पर जीत हासिल करेंगी. भावनाओं और हिंसा की पुनरावृत्ति के बाद एक नई राजनैतिक भावना या रस पैदा होगा जो प्रकृति के नियम और चक्र से परे हो. जैसे इतिहास में एक नाट्य प्रदर्शन होता है, जिसके अभिनेता और दर्शक दोनों एक ऐसी अनुभूति से गुज़रते हैं जो नई सोच से पैदा हुई है न कि उस 'पुरातन प्रकृति' या 'आदिम गुणों' से, जिनको इंसान की प्रकृति का हिस्सा माना जाता है. इसके खिलाफ, एक नया समाज और नई सोच पैदा होती है जिससे एक नया राजनैतिक 'रस' जन्म लेता है. 


यह दूसरी बात है कि फ्रांस और दुनिया के इतिहास में दहशतगर्द राज्य और क्रांतिकारी सोच इस नए रंगमंच और रस–यानी एक नए ऐतिहासिक बिंदु–पर कभी मिल नहीं पाए हैं. फ्रांस की क्रांति में जिस नीति को क्रांतिकारी दहशत कहा जाता था, वह रूस की क्रांति तक पहुंचते-पहुंचते, सीधे-सीधे राजकीय दहशत बन गई. इस राजकीय दहशत के दो पहलू हैं–विचारधारात्मक दहशत (आइडियोलॉजिकल स्टेट एपरेटस, राज्य के वैचारिक उपकरण) और सैनिक या पुलिसिया दहशत (कोएर्सिव स्टेट एपरेटस, राज्य के हिंसक उपकरण).
 

लेकिन यह भी याद रखने वाली बात है कि जब सोवियत रूस इस राजकीय दहशत की स्थापना कर रहा था, जिसकी मूर्ति स्तालिन है, तभी रूसी रंचमंच में एक ऐसी लहर दौड़ रही थी, जो भविष्य के एक ऐसे रंगमंच की कल्पना कर रही थी, जिसमें एक उत्तर-क्रांतिकारी इंसान ही उसके लेखकों, अभिनेताओं, दर्शकों की रचना करेगा. जिसकी नाट्य भावनाएं एक क्रांतिकारी सोच से मंझे नए सामूहिक स्थान, आकार, समय और समाज में प्रवाहित होंगी.
 

संभव है कि स्तालिन की विचारधारात्मतक (आइडियोलॉजिकल) दहशत, मेयरहोल्ड या मायकोव्स्की के उत्तर-क्रांतिकारी भविष्य की कल्पना से घबराते हुए हिंसा और भावना की पुनरावृत्ति पर उतर आए. संभव है क्रांतिकारी सोच, उस दौर में भी, राज्य की दहशत से जूझता, बचता, मरता हुआ, हर पुनरावृत्ति के आगे और परे एक नई कल्पना, नई सोच की निशानी पेश करता आया. हावी होने के बावजूद, राज्य की दहशत पूरी तरह उसे मिटा नहीं सकी. राजनीति में नया इंसान दहशत के साथ ही आया, उसे हिंसात्मक तरीके से थोपा गया, लेकिन आगे की राह उसने नई कल्पनाओं के जरिए बनाई. इसके लक्षण कला में जाहिर होते हैं, जहां हर पुनरावृत्ति से आगे और परे, एक अलग तरह का नया रस दिखता है. जहां एक नए तरह के समाज और भविष्य की कल्पना होती है, जिसकी सच्चाई इंसानों को प्रेरित करती है.

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7 नवंबर 1918 को अक्तूबर क्रांति की पहली सालगिरह पर व्सेवोलोद मेयेरहोल्ड ने एक नाटक पेश किया: मिस्ट्री-बूफे. मायकोव्स्की के लिखे इस नाटक को मेयरहोल्ड ने पेशेवर कलाकारों और थिएटर समूहों के बहिष्कार के बावजूद बड़ी मशक्कत से तैयार किया था. क्रांति के बाद यह पहला सोवियत नाटक था, जिसमें अभिनय करने के लिए सार्वजनिक अपील करनी पड़ी थी और आखिरकार छात्रों की बड़ी भागीदारी से इस नाटक को 7 नवंबर 1918 को खेला गया. राजकीय आयोजन होने के बावजूद, इस नाटक से सोवियत सत्ता प्रतिष्ठान को परेशानी थी, क्योंकि इसमें भविष्यवादी रचनाधर्मिता का भरपूर उपयोग किया गया था, जो मायकोव्स्की की खासियत थी और जो मेयरहोल्ड के क्रांतिकारी नजरिए से भी मेल खाती थी. ऐसा इसलिए था कि मेयरहोल्ड महसूस करते थे कि रंगकर्म को वर्तमान की समस्याओं पर गौर करते हुए भविष्य के लिए नई कल्पना को प्रेरित करना चाहिए, जो अपने अंतिम मकसद के रूप में एक नए इंसान के निर्माण और जरूरतों को ध्यान में रखे.


इसीलिए मेयरहोल्ड एक ऐसे रंगमंच को विकसित करने की प्रक्रिया में थे, जो स्मृतियों पर नहीं बल्कि सामाजिक मुद्राओं पर आधारित हो, जिसकी बनावट और बिंब विधान जाने-पहचाने अतीत का हवाला देने वाली पृष्ठभूमि बन कर न रह जाए, बल्कि उसमें ऐसे तत्व हों जो भविष्य की खातिर नई परिकल्पनाओं को उकसाएं. इसीलिए उन्होंने अपने रंगमंच में क्यूबिस्ट और फ्यूचरिस्ट कलाकारों को जगह दी. इस तरह वे कला की एक ऐसी भूमिका पर जोर दे रहे थे, जो ऐतिहासिक तो थी, लेकिन तो अतीत के किसी एक बिंदु पर ठहरी हुई नहीं थी. 
 

नाटक को मिली प्रतिक्रियाएं बहुत कड़ी थीं और महज तीन प्रदर्शनों के बाद इसके प्रदर्शन को रोक दिया गया. यह मानो बाईस साल बाद मेयरहोल्ड की गिरफ्तारी, यातनाओं और जेल में मौत की सजा का एक तरह से पूर्वाभास देती हुई घटना थी. 
 

अक्तूबर क्रांति बदलाव के एक ऐसे वादे के साथ हुई थी, जिसकी व्यापकता बहुत गहरी थी, जिसके दांव पर बहुत कुछ लगा था, लेकिन उसके पास इस वादे की कोई ठोस शक्ल नहीं थी, जिसको छू कर दिखाया जा सके कि क्रांति इसको हासिल करना चाहती है. ऐसे में, जब कुछ लेखक-कलाकारों ने उसे एक शक्ल देने की कोशिश की तो ऐसा क्यों हुआ कि उन्हें सत्ता के पूरे विरोध का सामना करना पड़ा?

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पहले बोल्शेविक रंगकर्मी के रूप में मेयरहोल्ड द्वारा निर्देशित इस पहले सोवियत नाटक के प्रदर्शन से दो दिन पहले पेत्रोग्राद्साकाया प्राव्दा  में ए.वी. लुनाचार्स्की की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जो उन दिनों पीपुल्स कमिसार फॉर एजुकेशन थे. यह टिप्पणी मेयरहोल्ड द्वारा अपने नाटक में किए जा रहे प्रयोगों के संदर्भ में थी, जिसमें लुनाचार्स्की ने भविष्यवादी कलाकारों द्वारा की गई 'लाखों गलतियों' के प्रति अपनी आशंकाएं व्यक्त करते हुए कहा था, "अगर बच्चा विकृत हो, तब भी यह हमें प्यारा होगा, क्योंकि यह उसी क्रांति की पैदाइश है, जिसको हम अपनी महान मां के रूप में देखते हैं."
 

बहुत कम टिप्पणियां इतने गहरे अर्थों वाली होती हैं. इस टिप्पणी में सोवियत संघ में आगे चल कर सामने आने वाले उस खौफनाक दौर की मानो एक भविष्यवाणी छिपी हुई थी, जिसमें असहमत नजरिए वाली कला को दबाया गया, पाबंदियां लगाई गईं, बहसों और तर्कों से परे जाकर, कलाकारों का यातनाएं दी गईं, वे गायब कर दिए गए, और उनकी हत्याएं तक हुईं. साथ ही, यह टिप्पणी जाहिर करती है कि क्रांति कला और संस्कृति के प्रति राज्य के संरक्षणवादी और सरपरस्ती भरे नजरिए को दूर नहीं कर पाई थी, जो अब तक के शासक वर्गों का नजरिया रहा था और जिसने कला को महज एक औजार, मतलब साधने की एक गतिविधि भर बना दिया था. 
लेकिन यह सब तो महज उस बड़ी समस्या के लक्षण थे, जिसकी झलक बहुत साफ तौर पर लुनाचार्स्की की इस टिप्पणी में ही मिलती है. वह है खुद क्रांति के बारे में नजरिया. यहां क्रांति, भविष्य का एक वादा, एक रचनात्मक सपना नहीं रह गई है. बल्कि यह एक 'महान मां' है, जिसको सवालों और संदेहों से परे एक पूज्य मूर्ति के रूप में देखा जाना है. मां मानो एक स्मारक है, जो अपने 'बेटों' की जिंदगियों को अपने साए में लिए हुए है. एक ऐसी उपस्थिति है, जिसका होना भर ही वर्तमान को वैध या अवैध बना देने के लिए काफी है. 
 

क्रांति को इस तरह देखना, यह एक ऐसी ऐतिहासिक सच्चाई का नकार थी, जिसमें क्रांति एक घटना, एक इवेन्ट होती है लेकिन यह नई प्रक्रिया को जन्म देती है, जो नजरिए, सोच, तौर-तरीकों और उम्मीदों को संभव बनाती है. यह घटना, उन नई प्रक्रियाओं के लिए एक संदर्भ की तरह मौजूद होती है, लेकिन ये प्रक्रियाएं सीधे-सीधे उसकी पाबंद नहीं होतीं और वे उससे आगे जाती हैं.
 

गौर कीजिए कि किस तरह लुनाचार्स्की, क्रांति का जिक्र करते हुए मेयरहोल्ड और मायकोव्स्की के नाटक को एक ही झटके में अवैध, लेकिन बर्दाश्त किए जाने लायक घोषित कर देते हैं. मेयरहोल्ड और मायकोव्स्की जिस नजरिए का प्रतिनिधित्व करते थे, उसके लिए कला रचना, महज प्रचार का मशीनी औजार नहीं थी, हालांकि मेयरहोल्ड ने खुद थिएटर को प्रचार के एक तंत्र के रूप में विकसित करने में अहम भूमिका निभाई. पहले बोल्शेविक रंगकर्मी और निर्देशक के रूप में उन्होंने फौरी राजनीतिक जरूरतों की भरपाई करने वाले प्रयोग किए, उन्होंने रंगशाला में संदेशों वाली तख्तियां लटकाईं, अंतराल के दौरान दर्शकों पर पर्चों की बारिश की गई, नाटकों के बीच में गृह युद्ध के ताजा समाचार देने के लिए बाइक सवार मंच पर लाए जाते. लेकिन बुनियादी रूप से, मेयरहोल्ड के लिए नाटक एक ऐसा माध्यम थे, जो प्रचार की फौरी जरूरतों को पूरा करते हुए, उससे आगे जाकर एक नए इंसान के निर्माण की अवधारणा पेश करे.
 

रूसी कलाकारों के संदर्भ में यह बात नई नहीं थी. जैसा कि जॉन बर्जर ने रेखांकित किया है, उनकी रचनाओं में अक्सर ही भविष्यवाणियां और आने वाले दिनों के पूर्वाभास हुआ करते थे. यह प्रक्रिया क्रांति के कुछ समय बाद तक जारी रही, लेकिन क्रांति के बाद अपनाई जाने वाली स्मारकीय दृष्टि और कला के क्षेत्र में अकादमिक नौकरशाही ने रूसी कलाकारों से उनकी यह खूबी भी छीन ली. क्रांति के बाद के समाज में जमीनी तौर पर जनता को रोटी, जमीन और शांति चाहिए थी, और सांस्कृतिक और वैचारिक गतिविधियों को मशीनी तौर पर इस मकसद को हासिल करने के लिए काम में लगा दिया गया. 
 

मेयरहोल्ड की परिकल्पनाओं में यह देखा जा सकता था कि क्रांति से जो नया उत्साह पैदा हुआ था, उसको वे नए इंसान के निर्माण की दिशा में मोड़ना चाहते थे. उनकी असहमति जिस नजरिए से थी, वह क्रांति को ही नहीं, क्रांति के बाद की हकीकत को, जिंदगी को स्मारक बना देने के करीब ले गया. 
 

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स्मारकीय सोच के अपने नुकसान होते हैं. फ्रांसीसी क्रांति ने बदलाव के स्मारकों को सामूहिक या राष्ट्रीय चाहत के साथ जोड़ा, लेकिन उसने स्मारकों की बुनियादी अवधारणा में कोई बदलाव नहीं किया कि मुख्यत: उनका ताल्लुक अतीत से होता है. वे वर्तमान में अतीत के उद्धरणों की तरह लिए जाएंगे. लेकिन सोवियत संघ ने इस अवधारणा के साथ एक गहरा प्रयोग किया. यहां स्मारकों को अतीत के एक निश्चित अवधि (घटना) और स्थान (संदर्भ) के उद्धरण से बढ़ा कर वर्तमान को परिभाषित करने वाली और उसकी पहचान को गढ़ने वाली जीवंत गतिविधि में तब्दील कर दिया गया. इसने स्मारकों को, खास कर राष्ट्रीय संदर्भ में, अतीत के दायरे से वर्तमान के दायरे में लाकर रख दिया. इसके बाद यह लगभग अनिवार्य बन गया, कि वर्तमान अपनी वैधता लगातार उस स्मारकीय संदर्भ से हासिल करे, जिसे यों तो अतीत में होना था, लेकिन जिसे वर्तमान की जिम्मेदार बना दिया गया है.


1930 और 40 के दशक में चली उस बहस का पूरा सिरा इससे जुड़ता है, जिसमें कथ्य और स्वरूप को लेकर गंभीर बहस हुई और जिसमें अपने समय के कई बड़े चिंतकों, रचनाकारों और दार्शनिकों ने भाग लिया, जिसमें उस समय के ज्यादातर दिग्गज कलाकारों और चिंतकों की भागीदारी थी मसलन अर्न्स्ट ब्लॉख, थियोडोर अडोर्नो, बेर्तोल्त ब्रेख्त, वाल्टर बेंजामिन और जॉर्ज लुकाच. आइजेन्सटाइन, द्जीगा वेर्तोव. स्नानिस्लाव्स्की, मेयेरहोल्ड.  जैसा कि नामों की इस सीमित सूची से ही जाहिर है, यह बहस, सिर्फ साहित्य तक ही सीमित नहीं रही और कला, थिएटर और सिनेमा जैसी विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों तक इसका विस्तार हुआ. इन बहसों का स्वरूप हमेशा औपचारिक और परस्पर वाद-विवाद का नहीं था, लेकिन वे एक दूसरे की रचनाओं और विचारों के संदर्भ में आगे बढ़ रही थीं और उनके सरोकारों में सबसे ऊपर यही चिंता थी कि एक ऐसे भविष्य के बरअक्स बदलते हुए वर्तमान को कैसे देखा जाए, जिसका एक बाहरी खाका तो हमारे पास है लेकिन जिसकी अंदरूनी शक्ल मौजूद नहीं है.
 

मोटे तौर पर दो भिन्न वैचारिक स्थितियों की पैरवी करने वाले दो समूहों ने – जो किसी भी लिहाज से अंदरूनी तौर पर आपस में सहमत लोगों से नहीं बने थे और उनमें आपस में काफी मतभेद थे – दो अलग अलग नजरियों की पैरवी की. एक का आग्रह अतीत से एक झटके से मुक्ति के साथ एक नए नजरिए की स्थापना थी, जिसमें एकदम नए तरह की रचना और चिंतन प्रक्रिया विकसित किए जाने की जरूरत थी.  दूसरे नजरिए में, परंपरागत कला रूपों में से कुछ को चुन कर वर्तमान और इसलिए एक सीमित भविष्य के लिए एक आदर्श के रूप में पेश किया गया.
 

एवरेइनोव और मेयरहोल्ड के नाटकों के संदर्भ में कई समानताएं देखी जा सकती हैं: वे एक ही अक्तूबर क्रांति की अलग-अलग सालगिरहें मनाने के लिए खेले गए. दोनों ही राजकीय आयोजन थे. दोनों में ही जनता की भागीदारी की परिकल्पना थी. इसके बावजूद, क्रांति के प्रति दोनों का व्यवहार उनके नतीजों को इतना अलग-अलग कर देता है. जैसा कि ऊपर कहा गया है, एवरेइनोव के प्रदर्शन ने क्रांति के साथ साथ, क्रांति के बाद के जीवन को भी एक स्मारक में तब्दील कर दिया.
 

एक स्मारक समय और स्थान, जैसा कि जॉन बर्जर इशारा करते हैं, दोनों के लिए एक चुनौती होता है. एक स्मारक एक द्वंद्व को, एक तनाव को ठहराव देता है, जिनका रिश्ता उन विशिष्ट स्थितियों से होता है, जिनमें उसे निर्मित किया गया होता है. तब एक ऐसे वर्तमान में स्मारकों को कैसे देखा जाए, जहां चीजें हर पल बदल रही हैं और हर विकल्प के अपने आयाम और द्वंद्व हैं? 
 

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रूसी क्रांति से ठीक सौ साल पहले, भारत के पश्चिमी हिस्से में स्थित ताकतवर पेशवा राज की सेना को हराते हुए भारतीय ब्रिटिश फौज की एक टुकड़ी ने भारत में औपनिवेशिक शासन को निर्णायक रूप में स्थापित करने में मदद दी. ब्रिटिशों की ओर से लड़ते हुए जीतने वाली यह रेजिमेंट महार लोगों से बनी थी, जो महाराष्ट्र की सबसे उत्पीड़ित जातियों में से एक से ताल्लुक रखते थे और तब की बोली में 'अछूत' कहे जाते थे. भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखे जाने वाले महार सैनिकों ने इतिहास में बदनाम ब्राह्मणवादी पेशवा राज को हमेशा के लिए दफ्न कर दिया. 1 जनवरी 1818 को हुई इस लड़ाई में मारे गए सैनिकों की याद में पुणे के पास कोरेगांव में एक स्मारक बनाया गया. 
 

इसके बाद का इतिहास उपनिवेशवादी सत्ता की क्रूरता, बर्बरता और लूट की सदी थी. यह पूरे समाज के लिए अनेक तरह की तबाहियां लेकर आई, लेकिन साथ ही इसने सबसे उत्पीड़ित तबकों के लिए जातीय और सामुदायिक गिरफ्त को ढीला भी किया. इसने उनके लिए शिक्षा, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी के दरवाजे खोले. पिछड़ों और दलितों द्वारा अपनी मुक्ति के आधुनिक आंदोलनों की बुनियाद भी इसी के बाद पड़ी. 
 

1927 की एक जनवरी को डॉ. बी.आर. आंबेडकर कोरेगांव स्मारक पर गए और इस जगह पर सालाना रैलियों का एक सिलसिला शुरू किया. किसी स्मारक के साथ आंबेडकर का यह शायद अकेला रिश्ता था. गेल ओमवेट लिखती हैं कि आंबेडकर इन रैलियों में कहा करते थे कि महारों ने ही भारत में ब्रिटिश सत्ता को स्थापित कराया था और महार ही इस सत्ता को यहां से उखाड़ सकते हैं.
 

यह वो दौर था, जब पूरे उपमहाद्वीप में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष चल रहे थे और इसको लेकर कोई विवाद नहीं था कि जनता के व्यापक हिस्से में आजादी की उम्मीदें थीं. लेकिन विवाद इसको लेकर था कि यह आजादी कैसी होगी. कोरेगांव स्मारक पर आंबेडकर का ऐलान इसकी सबसे क्रांतिकारी अभिव्यक्तियों में से एक थी. इसमें यह उम्मीद और मांग थी कि आनेवाली आजादी को प्रभुत्वशाली ब्राह्मणवादी विचारधारा और समाज की जातीय बनावट से मुक्त होना होगा. और इस मुक्ति को वो लोग हासिल करेंगे, जो इससे सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं. इस तरह आनेवाली सच्ची आजादी की कल्पना में ब्राह्मणवाद से मुक्ति की कल्पना भी शामिल थी. 
इस तरह अपनी रैलियों के जरिए, आंबेडकर ब्रिटिश सत्ता की निर्णायक विजय के उस स्मारक को स्वीकार नहीं कर रहे थे, बल्कि उसे चुनौती दे रहे थे. उन्हें कोरेगांव स्मारक के ऐतिहासिक अर्थ को ही उलट दिया था, जिसमें स्वीकार और नकार की एक जटिल प्रक्रिया काम कर रही थी. वे पेशवाओं की पराजय को स्वीकारते थे, लेकिन इसके नतीजे में स्थापित औपनिवेशिक सत्ता को वे इस योग्य नहीं मानते थे कि वह मुल्क पर शासन करे. वे उस स्मारक में निहित उस ऐतिहासिक पल को संभव बनाने वाले मानवीय श्रम और कुरबानियों को सम्मान दे रहे थे, जिनका योगदान आजादी और नए समाज के निर्माण के लिए प्रेरणा देगा. 
 

आंबेडकर जो कर रहे थे, वह सिर्फ एक स्मारक को चुनौती देने से कहीं अधिक था. यह स्मारकों की एक ऐसी अवधारणा को चुनौती थी, जिसके तहत उन्हें एक द्वंद्व रहित, सपाट संदेशों के रूप में देखा जाता है. यह ऐतिहासिक पलों को रूढ़ स्मृतियों में तब्दील करने का एक विरोध था. यह एक मांग थी कि इंसान की आजादी, बराबरी और तरक्की की उम्मीदों को अतीत की दुहाई देकर परे नहीं किया जा सकता. इस तरह आंबेडकर हमारी मदद करते हैं कि हम इतिहास के निर्माण में इंसानी कोशिशों की तरफ ध्यान दें, लेकिन साथ ही इसके अंतर्विरोधों और जटिलताओं को कभी अपनी नजरों से ओझल न होने दें. 
 

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बाद के दिनों में सोवियत संघ द्वारा समर्थित सामाजिक यथार्थवाद की अवधारणा पर बहस करते हुए बेर्तोल्त ब्रेख्त की सबसे बड़ी चिंता यही थी कि यह अवधारणा, अतीत के स्वरूपों को आज की सामग्री की अभिव्यक्ति के लिए एक आदर्श के रूप में पेश करती है. व्यापक राजनीतिक क्षेत्र में इस धारणा का विस्तार करके देखें तो इसका अर्थ यह भी हो सकता था कि समस्याओं के समाधान अपनी अभिव्यक्ति के लिए, अतीत के स्वरूपों को चुन सकते हैं.
 

1917 और उसके बाद के समाज के लिए अतीत का मतलब दूसरी चीजों के साथ-साथ पूंजीवाद भी था.


सौम्यव्रत चौधरी जेएनयू के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड ऐस्थेटिक्स में असोसिएट प्रोफेसर हैं. रेयाजुल हक इसी स्कूल से शोध कर रहे हैं.


समयांतर  के फरवरी 2017 अंक में प्रकाशित. 

नोट्स

[1] अक्सर 'फ्रेटर्निटी ' के लिए 'भाईचारा' शब्द का इस्तेमाल होता है, लेकिन यहां हम सोच-समझकर 'मैत्री' शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसका उपयोग डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने बुद्धा एंड हिज धम्म  में किया है. इस शब्द के इस्तेमाल की वजह यह है कि भाईचारा शब्द एक पारिवारिक रिश्ते का आभास देता है, जबकि मैत्री में दोस्ताना और बराबरी पर निहित होती है.  
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