Sustain Humanity


Saturday, October 1, 2016

আবারও উদ্বাস্তু দের নাগরিকত্বের দাবীর বিরোধিতা করল সিপিএম। কিন্তু এদের শাস্তি দেওয়ার উপায় নেই।কারন একটি বিলুপ্ত রাজনৈতিক দলকে আপনি কিভাবে শাস্তি দেবেন? কংগ্রেসও গতকাল উদ্বাস্তু দের নাগরিকত্বের বিরোধিতা করেছে। তাই উদ্বাস্তু দের অধিকার নিজেদের ই বুঝে নিতে হবে!

আবারও উদ্বাস্তু দের নাগরিকত্বের দাবীর বিরোধিতা করল সিপিএম। কিন্তু এদের শাস্তি দেওয়ার উপায় নেই।কারন একটি বিলুপ্ত রাজনৈতিক দলকে আপনি কিভাবে শাস্তি দেবেন? কংগ্রেসও গতকাল উদ্বাস্তু দের নাগরিকত্বের বিরোধিতা করেছে। তাই উদ্বাস্তু দের অধিকার নিজেদের ই বুঝে নিতে হবে!

निष्णात हम भारतीय नागरिक परमाणु विध्वंस का रास्ता चुन रहे हैं और यह हमारे इतिहास और भूगोल का सबसे बड़ा संकट है। नवजागरण की जमीन पश्चिम की रेनेशां कतई नहीं है! यह सिंधु घाटी और बौद्धमय भारत,चार्वाक दर्शन,संत फकीर पीर बाउल,किसान आदिवासी आंदोलनों की निरंतरता है! पलाश विश्वास

कारपोरेट प्रायोजित युद्धोन्माद में निष्णात हम भारतीय नागरिक परमाणु विध्वंस का रास्ता चुन रहे हैं और यह हमारे इतिहास और भूगोल का सबसे बड़ा संकट है।

नवजागरण की जमीन पश्चिम की रेनेशां कतई नहीं है!

यह सिंधु घाटी और बौद्धमय भारत,चार्वाक दर्शन,संत फकीर पीर बाउल,किसान आदिवासी आंदोलनों की निरंतरता है!

पलाश विश्वास

ईस्ट इंडिया कंपनी के राजकाज के खिलाफ पलाशी की लड़ाई में बंगाल के नवाब सिराजदौल्ला की हार के बाद लार्ड क्लाइव के भारत भाग्यविधाता बन जाने के बारे में बहुत ज्यादा चर्चा होती रही है।लेकिन 1757 से बंगाल बिहार और मध्य भारत के जंगल महल में चुआड़ विद्रोह से पहले शुरु आदिवासी किसान विद्रोह के अनंत सिलसिले के बारे में हम बहुत कम जानते हैं।हम चुआड़ विद्रोह के बारे में भी खास कुछ नहीं जानते और कंपनी राज के खिलाफ साधु, संत, पीर, बाउल फकीरों की अगवाई में बिहार और नेपाल से लेकर समूचे बंगाल में हुए हिंदू मुसलमान बौद्ध आदिवासी किसानों के आंदोलन को हम ऋषि बंकिम चंद्र के आनंदमठ और वंदे मातरम के मार्फत सन्यासी विद्रोह कहकर भारतीय राष्ट्रवाद और राष्ट्र को इसकी विविधता और बहुलता को सिरे से खारिज करते हुए हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्र का निर्माण करते हुए बहुसंख्य जनता के हक हकूक खत्म करने पर आमादा हैं।

बौद्धमय भारत के धम्म के बदले हम वैदिकी कबाइली युद्धोन्माद का अपना राष्ट्रवाद मान रहे हैं।जिसका नतीजा परमाणु युद्ध, जल युद्ध जो भी हो,सीमा के आर पार हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो के नगर अवशेषों  की जगह अंसख्य हिरोशिमा और नागासाकी का निर्माण होगा और करोड़ों लोग इस परमाणु युद्ध में शहीद होंगे तो जलयुद्ध के नतीजतन इस महादेश में फिर बंगाल और चीन की भुखमरी का आलम होगा।भारत विभाजन के आधे अधूरे जनसंख्या स्थानांतरण की हिंसा की निरतंरता से बड़ा संकट हम मुक्त बाजार के विदेशी हित में रचने लगे हैं। सीमाओं के आर पार ज्यादातर आबादी शरणार्थी होगी और हमारी अगली तमाम पीढिंया न सिर्फ विकलांग होंगी,बल्कि उन्हें एक बूंद दूध या एक दाना अनाज का नसीब नहीं होगा।अभी से बढ़ गयी बेतहाशा महंगाई और लाल निशान पर घूम फिर रहे अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतों को नजर अंदाज करके कारपोरेट प्रायोजित युद्धोन्माद में निष्णात हम भारतीय नागरिक आत्म ध्वंस परमाणु विध्वंस का रास्ता चुन रहे हैं और यह हमारे इतिहास और भूगोल का सबसे बड़ा संकट है।

गौरतलब है कि किसान आदिवासी आंदोलनों के हिंदुत्वकरण की तरह जैसे उन्हें हम ब्राह्मणवादी समाजशास्त्रियों के आयातित विमर्श के तहत सबअल्टर्न कहकर उसे मुख्यधारा मानेन से इंकार करते हुए सत्तावर्ग का एकाधिकार हर क्षेत्र में स्थापित करने की साजिश में जाने अनजाने शामिल है,उसीतरह  बंगाल के नवजागरण को हम यूरोप के नवजागरण का सबअल्टर्न विमर्श में तबादील करने से नहीं चुकते और नवजागरण के पीछे कवि जयदेव के बाउल दर्शन,चैतन्य महाप्रभु के वैष्णव आंदोलन के साथ साथ संत कबीर दास के साथ शुरु सामंतवाद और दिव्यता के विरुद्ध मनुष्यता की धर्मनरपेक्ष चेतना और इन सबमें तथागत गौतम बु्द्ध की सामाजिक क्रांति की निरंतरता के इतिहास बोध से हम एकदम अलग हटकर इस वैदिकी और ब्राह्मणी कर्मकांड के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन को पश्चिम की जुगाली साबित करने से चुकते नहीं है।

इसी तरह मतुआ आंदोलन की पृष्ठभूमि 1857 की क्रांति से पहले कंपनी राज के खिलाफ किसानों के ऐतिहासिक विद्रोह नील विद्रोह से तैयार हुई और इस आंदोलन के नेता हरिचांद ठाकुर नें बंगाल बिहार में हुए मुंडा विद्रोह के महानायक बिरसा मुंडा की तर्ज पर सत्ता वर्ग के धर्म कर्म का जो मतुआ विकल्प प्रस्तुत किया,उसके बारे में हम अभी संवाद शुरु ही नहीं कर सके हैं।यह तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति को बंगाल में तेरहवीं सदी से आयातित ब्राह्मणधर्म के खिलाफ फिर बौद्धमय बगाल बनाने के उपक्रम बतौर हमने अभीतक देखा नहीं  है और विद्वतजन इस भी सबअल्टर्न घोषित कर चुके हैं और मुख्यधारा से बंगाल के जाति धर्म निर्विशेष बहुसंख्य आम जनता, किसानों और आदिवासियों को अस्पृश्यता की हद तक काट दिया है और इसी साजिस के तहत बंगाली दलित शरणार्थियों को बंगाल से खदेड़कर उन्हें विदेशी तक करार देनें में बंगाल की राजनीति में सर्वदलीय सहमति है।

बंगाल में मतुआ आंदोलन भारत और बंगाल में ब्राह्मण धर्म और वैदिकी कर्मकांड के विरुद्ध समता और न्याय की तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति की निरंतरता रही हैऔर जैसे गौतम बुद्ध को आत्मसात करने के लिए विष्णु का आविस्कार हुआ वैसे ही हरिचांद ठाकुर को भी विष्ण का अवतार मैथिली ब्राह्मण बाकी बहुसंख्य जनता की अस्पृश्यता बहाल रखने की गहरी साजिश है जिसके तहत मतुआ आंदोलन अब महज सत्ता वर्ग का खिलौना वोट बंके में तब्दील है।यह महसूस न कर पाने की वजह से हम मतुआ आंदोलन का ब्राह्मणीकरण रोक नहीं सके हैं और इसी तरह दक्षिण भारत में सामाजिक क्रांति की पहल जो लिंगायत आंदोलन ने की,ब्राह्मणधर्म विरोधी सामंतवाद विरोधी अस्पृश्यता विरोधी उस आंदोलन का हिंदुत्वकरण भी हम रोक नहीं सके हैं।

इसीलिए बंगाल में मतुआ आंदोलन के हाशिये पर चले जाने के बाद कर्नाटक में भी जीवन के हर क्षेत्र में लिंगायत अनुयायियों का वर्चस्व होने के बावजूद वहां केसरिया एजंडा गुजरात की तरह धूम धड़के से लागू हो रहा है।वहीं,महात्मा ज्योतिबा फूले और अंबेडकर की कर्मभूमि में शिवशक्ति और भीमशक्ति का महागठबंधन वहां के बहुजनों का केसरियाकरण करके उनका काम तमाम करने लगा है और बहुजनों के तमाम राम अब हनुमान है तो अश्वमेधी नरसंहार अभियान में बहुजन उनकी वानरसेना है।

दक्षिण भारत में पेरियार और नारायण गुरु ,अय्यंकाली सिनेमाई ग्लेमर में निष्णात है और उसकी कोई गूंज न वहां है और न बाकी भारत में।पंजाब में सिखों के सामाजिक क्रांतिकारी आंदोलन भी हिंदुत्व की पिछलग्गू राजनीति के शिकंजे में है और अस्सी के दशक में हिंदुत्व के झंडेवरदारों ने उनका जो कत्लेआम किया,उसके मुकाबले गुजरात नरसंहार की भी तुलना नहीं हो सकती।लेकिन सिखों को अपने जख्म चाटते रहने की नियति से निकलने के लिए गुरु ग्रंथ साहिब में बतायी दिशा नजर नहीं आ रही है।तमिल द्रविड़ विरासत से अलगाव,सिंधु सभ्यता के विभाजन के ये चमत्कार हैं।

सिंधु घाटी के नगरों में पांच हजार साल पहले बंगाल बिहार की विवाहित स्त्रियों की तरह स्त्रियां शंख के गहने का इस्तेमाल करती थींं,हड़प्पा और मोहंजोदोड़़ो के पुरात्तव अवशेष में वे गहने भी शामिल हैं।लेकिन गौतम बुद्ध के बाद अवैदिकी विष्णु को वैदिकी कर्मकांड का अधिष्ठाता बनाकर तथागत गौतम बुद्ध को उनका अवतार बनाने का जैसे उपक्रम हुआ,वैसे ही भारत में बौद्धकाल और उससे पहले मिली मूर्तियों को,यहां तक की गौतम बुद्ध की मूर्तियों को भी विष्णु की मूर्ति बताने में पुरतत्व और इतिहास के विशेषज्ञों को शर्म नहीं आती।

सिंधु सभ्यता का अवसान भारत में वैदिकी युग का आरंभ है तो बुद्धमय भारत में वैदिकी काल का अवसान है।फिर बौद्धमय भारत का अवसान आजादी के सत्तर साल बाद भी खंडित अखंड भारत में मनुस्मृति के सामांती बर्बर असभ्य फासिस्ट रंगभेदी मनुष्यता विरोधी नरसंहारी राजनीति राजकाज है।मुक्तबाजार है।युद्धोन्माद यही है।

इस बीच आर्यावर्त की राजनीति पूरे भारत के भूगोल पर कब्जा करने के लिए फासिस्ट सत्तावर्ग यहूदियों की तरह अनार्य जनसमूहों आज के बंगाली, पंजाबी, सिंधी, कश्मीरी, तिब्बती, भूटिया,आदिवासी, तमिल शरणार्थियों की तरह भारतभर में बहुजनों का सफाया आखेट अभियान जारी है।क्योकि वे अपनी पितृभूमि से उखाड़ दिये गये बेनागरिक खानाबदोश जमात में तब्दील हैं। जिनके कोई नागरिक और मानवाधिकार नहीं हैं तो जल जंगल जमीन आजीविकता के हरक हकूक भी नहीं हैं।मातृभाषा के अधिकार से भी वे वंचित हैं।भारत विभाजन का असल एजंडा इसी नरसंहार को अंजाम देने का रहा है,जिससे आजादी या जम्हूरियता का कोई नाता नहीं है। सत्ता वर्ग की सारी कोशिशें उन्हें एकसाथ होकर वर्गीय ध्रूवीकरण के रास्ते मोर्चबंद होने से रोकने की है और इसीलिये यह मिथ्या राष्ट्रवाद है,अखंड धर्मोन्मादी युद्ध परिस्थितियां हैं।

भारत से बाहर रेशम पथ के स्वर्णकाल से भी पहले सिंधु सभय्ता के समय से करीब पांच हजार साल पहले मध्यएशिया के शक आर्य खानाबदोश साम्राज्यों के आर पार हमारी संस्कृति और रक्तधाराएं डेन मार्क,फिनलैंड,स्वीडन से लेकर सोवियात संघ और पूर्वी एशिया के स्लाव जनसमूहों के साथ घुल मिल गयी हैं और वहीं प्रक्रिया करीब पांच हजार साल तक भारत में जारी रही हैं।जो विविधता और बहुलता का आधार है,जिससे भारत भारततीर्थ है।यही असल में भारतीयता का वैश्वीकरण की मुख्यधारा है और फासिज्म का राजकाज इस इतिहास और भूगोल को खत्म करने पर तुला है।

पांच हजार साल से भारतीय साझा संस्कृति और विरासत का जो वैश्वीकरण होता रहा है,उसे सिरे से खारिज करके युद्धोन्मादी सत्तावर्ग बहुसंख्य जनता का नामोनिशान मिटाने पर तुला ब्राह्णधर्म की मनुस्मृति लागू करने पर आमादा है और व्यापक पैमाने पर युद्ध और विध्वंस उनका एजंडा है, उनका अखंड भारत के विभाजन का एजंडा भी रहा है ताकि सत्ता,जल जंगल जमीन के दावेदारों का सफाया किय जा सकें, और अब उनका एजंडा यही है कि मुक्तबाजार में हम अपने लिए सैकड़ों हिरोशिमा और नागासाकी इस फर्जी नवउदारवाद,फर्जी वैश्वीकरण के भारत विरोधी हिंदू विरोधी,धम्म विरोधी,मनुष्यता और प्रकृति विरोधी अमेरिकी उपनिवेश में सत्ता वर्ग के अपराजेय आधिपात्य के लिए अंध राष्ट्रवाद के तहत परमाणु विध्वंस चुन लें।यही राजनीति है।यही राजकाज है और यही राजनय भी है।यह युद्धोन्माद दरअसल राजसूय यज्ञ का आयोजन है और अश्वमेधी घोड़े सीमाओं के आर पार जनपदों को रौंदते चले जा रहे हैं।हम कारपोरेट आंखों से वह नजारा देख कर भी देख नहीं सकते।

मोहनजोदोड़ो और हड़प्पा की सिंधु घाटी के शंख के गहने अब बंगाल बिहार और पूर्वी भारत की स्त्रियां पहनती हैं।पश्चिम भारत और उत्तर भारत की स्त्रियां नहीं। इसीतरह सिंधु सभ्यता में अनिवार्य कालचक्र इस देश के आदिवासी भूगोल में हम घर में उपलब्ध है।हम इतिहास और भूगोल में सिंधु सभ्यता की इस निरंतरता को जैसे नजरअंदाज करते हैं वैसे ही धर्म और संस्कृति में एकीकरण और विलय के मार्फत मनुष्यता की विविध बहुल धाराओं की एकता और अखंड़ता को नामंजूर करके भारतीय राष्ट्रवाद को सत्ता वर्ग का राष्ट्रवाद बनाये हुए हैं और भारत राष्ट्र में बहुजनों का कोई हिस्सा मंजूर करने को तैयार नहीं है।इसलिए संविधान को खारिज करके मनुस्मृति को लागू करने का यह युद्ध और युद्धोन्माद है।

इसीतरह सिंदु सभ्यता से लेकर भारत में साधु,संत,पीर,फकीर ,बाउल, आदिवासी, किसान विरासत की जमीन पर शुरु नवजागरण को हम देशज सामंतवाद विरोधी,दैवीसत्ता धर्मसत्ताविरोधी,पुरोहित तंत्र विरोधी  मनुष्यता के हक हकूक के लिए सामाजिक क्रांति के बतौर देखने को अभ्यस्त नहीं है। मतुआ, लिंगायत, सिख, बौद्ध, जैन आंदोलनों की तरह यह नवजागरण सामंती मनुस्मृति व्यवस्था,वैदिकी कर्म कांड और पुरोहित तंत्र के ब्राह्मण धर्म के खिलाफ महाविद्रोह है,जिसने भारत में असभ्य बर्बर अमानवीय सतीदाह,बाल विवाह,बेमेल विवाह जैसी कुप्रथाओं का अंत ही नहीं किया,निरीश्वरवाद की चार्वाकीय लोकायत और नास्तिक दर्शन को सामाजिक क्रांति का दर्शन बना दिया।जिसकी जमीन फिर वेदांत और सर्वेश्वरवाद है।या सीधे ब्रह्मसमाज का निरीश्वरवाद।वहीं रवींद्रकाव्य का दर्शन है।

नवजागरण के तहत शूद्र दासी देवदासी देह दासी  स्त्री को अंदर महल की कैद से मुक्ति मिली तो विधवाओं के उत्पीड़न का सिलसिला बंद होकर खुली हवा में सांस लेने की उन्हें आजादी मिली।सिर्फ साड़ी में लिपटी भारतीय स्त्री के ब्लाउज से लेकर समूचे अंतर्वस्त्र का प्रचलन ब्रह्मसमाज आंदोलन का केंद्र बने रवींद्र नाथ की ठाकुर बाड़ी से शुरु हुआ तो नवजागरण के समसामयिक मतुआ आंदोलन का मुख्य विमर्श ब्राह्मण धर्म और वैदिकी कर्मकांड के खिलाफ तथागत गौतम बुद्ध का धम्म प्रवर्तन था तो इसीके साथ नवजागरण,मतुआ आंदोलन,लिंगायत आंदोलन से लेकर महात्मा ज्योतिबा फूले और माता सावित्री बाई फूले के शिक्षा आंदोलन का सबसे अहम एजंडा शिक्षा आंदोलन के तहत स्त्री मुक्ति का रहा है।

मतुआ आंदोलन का ज्यादा मह्तव यह है कि इसके संस्थापक हरिचांद ठाकुर न सिर्फ नील विद्रोह में किसानों का नेतृत्व कर रहे थे,बल्कि उनके मतुआ आंदोलन का सबसे अहम एजंडा भूमि सुधार का था।जो फजलुल हक की प्रजा समाज पार्टी का मुख्य एजंडा रहा है और फजलुल हक को हरिचांद ठाकुर के पुत्र गुरुचांद ठाकुर और उनके अनुयायियों जोगेंद्र नाथ मंडल  का पूरी समर्थन था।इसी भूमि सुधार एजंडे के तहत बंगाल में 35  साल तक वाम शासन था और 1901 में ढाका में मुस्लिम लीग बन जाने के बावजूद मुस्लिम लाग और हिंदू महासभा के ब्राह्मण धर्म का बंगाल में कोई जमीन या कोई समर्थन नहीं मिला।इन्हीं जोगेंद्र नाथ मंडल ने भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान का संविधान लिखा तो विभाजन से पहले बैरिस्टर मुकुंद बिहारी मल्लिक के साथ बंगाल से अंबेडकर को संविधान सभा में पहुंचाया।बाद में 1977 का चुनाव जीत कर बंगाल में वाममोर्चा ने भूमि सुधार लागू करने की पहल की।बहुजन समाज की इस भारतव्यापी मोर्चे को तोड़ने के लिए ही बार बार विभाजन और युद्ध के उपक्रम हैं।

ऐसा पश्चिमी नवजागरण में नहीं हुआ। नवजागरण के नतीजतन फ्रांसीसी क्रांति,इंग्लैंड की क्रांति या अमेरिका की क्रांति में स्त्री अस्मिता या स्त्री मुक्ति का सवाल कहीं नहीं था और न ही भूमि सुधार कोई मुद्दा था।भारत के स्वतंत्रता संग्राम में किसानों और आदिवासियों के आंदोलन की विचारधारा और दर्शन के स्तर पर जर्मनी और इंग्लैंड से लेकर समूचे यूरोप में धर्म सत्ता और राजसत्ता के खिलाफ विद्रोह से हालांकि तुलना की जा सकती है,जो अभी तक हम कर नहीं पाये हैं।

इसलिए नवजागरण की सामाजिक क्रांति के धम्म के बदले राजसत्ता और धर्मसत्ता में एकाकार ब्राह्मण धर्म के हम शिकंजे में फंस रहे है।इससे बच निकलने की हर दिशा अब बंद है।रोशनदान भी कोई खुला नजर नहीं आ रहा है।

नवजागरण आंदोलन और भारतीय साहित्य में माइकेल मधुसूदन ने जो मेघनाथ वध लिखकर लोकप्रिय आस्था के विरुद्ध राम को खलनायक बनाकर मेघनाथ वध काव्य लिखा और आर्यावर्त के रंगभेदी वर्चस्व के मिथक को चकनाचूर कर दिया, नवजागरण के सिलसिले में उनकी कोई चर्चा नहीं होती और अंबेडकर से बहुत पहले वैदिकी,महाकाव्यीय मनुस्मृति समर्थक मिथकों को तोड़ने में उनकी क्रांतिकारी भूमिका के बारे में बाकी भारत तो अनजान है है,बंगाल में भी उनकी कोई खास चर्चा छंदबद्धता तोड़क मुक्तक में कविता लिखने की शुरुआत करने के अलावा होती नही है।

हम अपने अगले आलेख में उन्हीं माइकेल मधुसूदन दत्त और उनके मेघनाथ वध पर विस्तार से चर्चा करेंगे।अभी नई दिहाड़ी मिली नहीं है,तो इस मोहलत में हम भूले बिसरे पुरखों की यादें ताजा कर सकते हैं।तब तक कृपया इंतजार करें।



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Friday, September 30, 2016

Sushanta Kar ধনধান্যে পুষ্পে ভরা আমাদের এই বসুন্ধরা... এই গানটি এক রানীর গলাতেই বসানো হয়েছিল। তার পরে যে কৃষক খেতে পায় না, তার সামনেও অশালীন ভাবে বহুবার গাওয়া হয়েছিল। এখনো হয়। লেখা হয়েছিল সেই ঔপনিবেশিক শাসনের সময়ে যার শাসনের শুরু এবং শেষে শুধু বাংলাদেশেই কয়েক কোটি মানুষ না খেয়ে মরে গেছিলেন। আমরা কেমন এক মায়ার জগতে বাস করতে বেশ ভালোবাসি। যে সত্য উচ্চারণ করে, তার কণ্ঠরোধ করতে আমরা সদা উৎসাহী।

ধনধান্যে পুষ্পে ভরা আমাদের এই বসুন্ধরা... এই গানটি এক রানীর গলাতেই বসানো হয়েছিল। তার পরে যে কৃষক খেতে পায় না, তার সামনেও অশালীন ভাবে বহুবার গাওয়া হয়েছিল। এখনো হয়। লেখা হয়েছিল সেই ঔপনিবেশিক শাসনের সময়ে যার শাসনের শুরু এবং শেষে শুধু বাংলাদেশেই কয়েক কোটি মানুষ না খেয়ে মরে গেছিলেন। আমরা কেমন এক মায়ার জগতে বাস করতে বেশ ভালোবাসি। যে সত্য উচ্চারণ করে, তার কণ্ঠরোধ করতে আমরা সদা উৎসাহী।

बक्सादुआर के बाघ,कर्नल लाहिड़ी का आदिवासी जीवन पर नायाब उपन्यास


बक्सादुआर के बाघ,कर्नल लाहिड़ी का आदिवासी जीवन पर नायाब उपन्यास
पलाश विश्वास
अभी अभी कर्नल भूपाल चंद्र लाहिड़ी के बहुचर्चित बांग्ला उपन्यास बक्सा दुआरेर बाघ के अनुवाद को अंतिम रुप दे दिया है। उत्तर बंगाल के बक्सा जंगल के विभिन्न आदिवासी समूह के रोजमर्रे की जिंदगी,इनके समूह जीवन,भाषा और संस्कृति और उनके खिलाफ जारी दमनात्मक शोषण के जुल्मोसितम के मद्देनर भारत के लोकतंत्र,कानून व्यवस्था,सरकार और प्रशासन,राजनीति और संविधान,वन और वन अधिनियम के विविध आयाम और उनके प्रतिरोध का सिलसिलेवार ब्यौरा समेत बेहद दिलचस्प उपन्यास है।गारो और राभा जैसे आदिवासी समूहों की भाषा को यथासंभव उसकी मौलिकता के साथ,संगीतबद्धता के साथ संप्रेषित करने में हमने लिंग्वस्टिक्स और फोनेटिक्स का सहारा लिया।
कर्नल भूपाल लाहिड़ी ने सैन्य रोजनामचे पर भी बहुत बेहतरीन लिखा है।इस वक्त हफ्ते में चार दिन उनका डायलिसिस जारी है और इसके बावजूद उनकीजनप्रतिबद्ध जीजिविषा देखेने पर हमें अपनी मानसिक कमजोरी पर शर्म आ रही है।अस्सीपार लगातार अस्वस्थ चल रहे कर्नल लाहिड़ी अपने घर पर ओवी वैन खड़ा करके सुंदरवन के बच्चों को नियमित पढ़ा रहे हैं।
मैं बेहद जल्दी यह काम पूरा करना चाहता था।फिरभीमहीनेभर लग गया।इस बीच कुछ और छिटपुट अनुवाद के अलावा नियमित लेखन भी जारी रखना हुआ।शरणार्थी आंदोलन के सिलसिले में कोलकाता और उत्तर बंगाल तक की जगह जाना पड़ा।
बांग्लादेश के कथाकारों की जनपद भाषा में लिखी कहानियों के अनुवाद के बाद बक्सादुआर का यह अनुवाद बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है।किताब छपेगी तो इसकी प्रतिक्रिया का मुझे इंतजार रहेगा।
अब अनुवाद के जरिये ही मुझे दिहाड़ी कमाकर जीना है तो लिखने के साथ ही जनप्रतिबद्धता के मोर्चे पर निरंतर सक्रियता मेरे लिए आगे और बड़ी चुनौती बनने वाली है।
मित्रों से आग्रह है कि मुझे मेरी दिहाड़ी से वंचित करके बेवजह दौड़ाये नहीं।जहां जाना अनिवार्य होगा,वहां मैं खुद चला जाउंगा।लेकिन जहां जा नहीं सकता,उसके लिए माफी की जरुरत रहेगी।

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Where should Hindu refugees go with Geeta in Hand,to Pakistan or Afghanistan?

Where should Hindu refugees go with Geeta in Hand,to Pakistan or Afghanistan?
২০১২ সালে গৌহাটীতে নিখিল ভারত বাঙালি উ স সমিতির মঞ্চে দেওয়া ভাষনে  হিমন্ত বিশ্বশর্মা এখনও অনড়। হিমন্ত দল ত্যাগ করলেও নীতির পরিবর্তন করেন নাই।
Second in Commander in Assam BJP Government HIMANTO Vishwakarma demands citizenship for partition victim every refugee coming from East Bengal contrary to the BJP governance in Assam or India which denies citizenship to East Bengal refugees and specifically in Assam the ULFA agenda to deport all NON Assamese out of Assam targets Hindnu refugees also and more than 800 hundred Hindu refugees have been subjected to inhuman persecution in Assam and refugees have been put in DETENTION Camps as Ulfa treats everyone foreigner whoever entered in Assam after 1951 including Hindu,Buddhist,Barua,Chakma and Muslim refugees from East Bengal and Bihari, Bengali, Rajsthani and Punjabi citzens for other states in India.

Daink Jugashankha from Guahati and Kolkata has published latest statement of Minister Himanta Vishwakarma who crossed fence to land in RSS camp deserting Congress and ex CM Tarun Gogoi.He supported Nikhil Bharat Udvastu Samanyay Smiti movement in Assam as Congress leader and now speaks in RSS linguistics rejecting Ulfa demand to set 1951 as cut off year to identify foreigners in Assam.
Palash Biswas

Thursday, September 29, 2016

हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर! पलाश विश्वास

हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर!

पलाश विश्वास

पहलीबार टीवी पर युद्ध का सीधा प्रसारण खाड़ी युद्ध के दौरान अमेरिकी मीडिया ने किया अमेरिका के उस युद्ध को अमन चैन के लिए  इराक के खिलाफ पूरी दुनिया का युद्ध साबित करने के लिए।दुनियाभर का मीडिया उसीके मुताबिक विश्व जनमत तैयार करता रहा और तेल कुंओं की आग में तब से लेकर अबतक सारी दुनिया सुलग रही है।

नतीजतन आधी दुनिया अब शरणार्थी सैलाब से उसीतरह लहूलुहान है,जैसे हम इस महादेश के चप्पे चप्पे पर सन सैंतालीस के बाद से लगातार लहूलुहान होने को अभिशप्त हैं।अमेरिका के उस युद्ध की निरंतरता से महान सोवियत संघ का विखंडन हो गया और सारा विश्व ग्लोब में तब्दील होकर अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील है।सारी सरकारें और अर्थव्यवस्थाएं अब वाशिंगटन की गुलाम हैं और उसीके हित साध रही हैं।

मनुष्यता अब पिता की हाथों से बिछुड़कर समुंदर में तैरती लाश है और फिंजा सरहदों के आर पार कयामत है।

सरकारी आधिकारिक बयान के अलावा अब तक किसी सच को सच मानने का रिवाज नहीं है और वाशिंगटन का झूठ ही सच मानती रही है दुनिया।दो दशक बाद उस सच के पर्दाफाश के पर्दाफाश के बावजूद  दहशतगर्दी और अविराम युद्धोन्माद, विश्वव्यापी शरणार्थी सैलाब,गृहयुद्धों और प्राकृतिक संसाधनों के लूटखसोट पर केंद्रित नरसंहारी मुक्तबाजार में कैद मनुष्यता की रिहाई के सारे दरवाजे खिड़किया बंद हैं और हम पुशत दर पुश्त हिरोशिमा और नागाशाकी,भोपराल गैस त्रासदी,सिख नरसंहार, असम त्रिपुरा के नरसंहार,आदिवासी भूगोल में सलवा जुड़ुम और बाबरी विध्वंस के बाद गुजरात प्रयोग की निरंतरता के मुक्तबाजार के तेल कुंओं में झलसते रहेंगे।मेहनतकशों के हाथ पांव कटते रहेंगे,युवाओं के सपनों का कत्लगाह बनता रहेगा देश,स्त्री दासी बनी रहेगी,बच्चे शरणार्थी होते रहेंगे और किसान खुदकशी करते रहेंगे।दलितों,आदिवासियों और आम जनता पर जुल्मोसिताम का सिलसिला जारी रहेगा।

इसलिए सर्जिकल स्ट्राइक के सच झूठ के मल्टी मीडिया फोर जी ब्लिट्ज और ब्लास्ट पर मुझे फिलहाल कुछ कहना नहीं है।मोबाइल पर धधकते युद्धोन्माद पर कुछ कहना बेमायने है।राष्ट्रद्रोह तो मान ही लिया जायेगा यह।

हम अमेरिकी उपनिवेश हैं और अमेरिकी नागरिकों की तरह वियतनाम युद्ध और खाड़ी युद्ध के विरोध की तर्ज पर किसी आंदोलन की बात रही दूर,विमर्श,संवाद और अभिव्यक्ति के लिए भी हम आजाद नहीं है क्योंकि यह युद्धोन्माद भी उपभोक्ता सामग्री की तरह कारपोरेट उपज है और हम जाने अनजाने उसके उपभोक्ता हैं। उपभोक्ता को कोई विवेक होता नहीं है।सम्यक ज्ञान और सम्याक प्रज्ञा की कोई संभावना कही नहीं है और न इस अनंत युद्धोन्माद से कोई रिहाई है।धम्म लापता है।

हम लोग ग्लोबीकरण की अवधारणा के तहत इस दुनिया को अपनी मुट्ठी में लेने की तकनीक के पीछे बेतहाशा भाग रहे हैं।यह वह दुनिया है जिसके पोर पोर से खून चूं रहा है।हमारी मुट्ठी में अब खून से लबालब सात समुंदर हैं।जिसमें हमारे अपनों का खून भी पल दर पल शामिल होता जा रहा है।अपनी मुट्ठी में कैद इस दुनिया की हलचल से लेकिन हम बेखबर हैं।खबरें इतनी बेहया हो गयी हैं कि उनमें विज्ञापन के जिंगल के अलावा जिंदगी की कोई धड़कन नहीं है।सच का नामोनिशां बाकी नहीं है।

1991 के बाद,पहले खाड़ी युद्ध के तुरंत बाद से पिछले पच्चीस सालों से हम अमेरिकी उपनिवेश हैं।हमें इसका कोई अहसास नहीं है।सूचना क्रांति के तिलिस्म में हम दरअसल कैद हैं और प्रायोजित पाठ के अलावा हमारा कोई अध्ययन, शोध, शिक्षा, माध्यम,विधा,लोक,लोकायत,परंपरा ,संस्कृति या साहित्य नहीं है।सबकुछ मीडिया है।

हालांकि उपनिवेश हम कोई पहलीबार नहीं बने हैं।फर्क यह है कि करीब दो सौ साल के ब्रिटिश हुकूमत का उपनिवेश बनकर इस महादेश का एकीकरण हो गया। अब अमेरिकी उपनिवेश बन जाने की वजह से गंगा उल्टी बहने लगी है।भारत विभाजन के बाद बचा खुचा भूगोल और इतिहास लहूलुहान होने लगा है और किसानों ,मेहनतकशों की दुनिया में नरसंहारी अश्वमेधी सेनाएं दौड़ रही हैं।साझा इतिहास भूगोल समाज और संस्कृति का ताना बाना बिखरने लगा है।उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो गयी है और औद्योगीकीकरण से जो वर्गीय ध्रूवीकरण की प्रक्रिया शुरु हो गयी थी,जो जाति व्यवस्था नये उत्पादन संबंधों की वजह से खत्म होने लगी थी,मनुस्मृति अनुशासन के बदले जो कानून का राज बहाल होने लगा था और बहुजन समाज वर्गीय ध्रूवीकरण के तहत आकार लेने लगा था,वह सबकुछ इस अमेरिकी उपनिवेश में अब खत्म है या खत्म होने को है।

ब्राह्मण धर्म जो तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति से खत्म होकर उदार हिंदुत्व में तब्दील होकर ढाई हजार साल तक इस महादेश की विविधता और बहुलता को आत्मसात करते रहा है,फिर मुक्तबाजार का ब्राह्मणधर्म है,जो भारतीय संविधान की बजाय फिर मनुस्मृति लागू करने पर आमादा है।धम्म फिर सिरे से गायब है।

एकीकरण की बजाय अब युद्धोन्माद का यह मुक्तबाजार हिंदुत्व का ब्राह्मणधर्म है और हमारी राष्ट्रीयता कारपोरेट युद्धोन्माद है।महज सत्तर साल पहले अलग हो गये इस महादेश के अलग अलग राजनितिक हिस्से परमाणु युद्ध और उससे भी भयंकर जलयुद्ध के लिए निजी देशी विदेशी कंपनियों की कारपोरेट फासिज्म के तहत एक दूसरे को खत्म करने पर आमादा हैं जबकि विभाजन के सत्तर साल के बाद भी इन तमाम हिस्सों में संपूर्ण कोई ऐसा जनसंख्या स्थानांतरण हुआ नहीं है कि इस युद्ध में सीमाओं के आरपार बहने वाली खून की नदियों में हमारा वजूद लहूलुहान हो।अकेले बांग्लादेश में दो करोड हिंदू है तो भारत में मुसलमानों की दुनियाभर में सबसे बड़ी आबादी है और कुलस मिलाकर यह महादेश कुलमिलाकर अब भी एक सांस्कृतिक अविभाज्य ईकाई है,जिसे हम तमाम लोग सिरे से नजर्ंदाज कर रहे हैं।

कलिंग युद्ध से पहले,सम्राट अशोक के बुद्धमं शरणं गच्छामि उच्चारण से पहले सारा देश कुरुक्षेत्र का महाभारत बना हुआ था।सत्ता की आम्रपाली पर कब्जा के लिए हमारे गणराज्य खंड खंड राष्ट्रवाद से लहूलुहान हो रहे थे। दो हजार साल का सफर तय करने के बाद हमने बरतानिया के उपनिवेश से रिहा होकर अखंड भारत न सही,उसी परंपरा में नया भारतवर्ष  साझा विरासत की नींव पर बना लिया है।अबभी हमारा राष्ट्रवाद अंध खंडित राष्ट्रवाद युद्धोन्मादी है।धम्म नहीं है कहीं भी।

हमारी विकास यात्रा सिर्फ तकनीकी विकास यात्रा नहीं है और न यह कोई अंतरिक्ष अभियान है।हम इतिहास के रेशम पथ पर सिंधु घाटी से लेकर अबतक लगातार इस महादेश को अमन चैन का भूगोल बनाने की कवायद में लगे रहे हैं। तथागत गौतम बुद्ध ने जो सत्य अहिंसा के धम्म के तहत इस महादेश को एक सूत्र में बांधने का उपक्रम शुरु किया था,वह सारा इतिहास अब धर्मोन्मादी युद्धोन्माद है।

आज मुक्त बाजार का कारपोरेट तंत्र मंत्र यंत्र फिर उसी युद्धोन्माद का आवाहन करके हमें चंडाशोक में तब्दील कर रहा है और हम सबके हाथों में नंगी तलवारें सौंप रहा है कि हम एक दूसरे का गला काट दें।

ब्रिटिश राज के दरम्यान अफगानिस्तान से लेकर म्यांमर,सिंगापुर,श्रीलंका से लेकर नेपाल तक हमारा भूगोल और इतिहास की साझा विरासत हमने सहेज ली। सामंती उत्पादन प्रणाली के नर्क से निकलकर हम औद्योगिक उत्पादन प्रणाली में शामिल हुए।ब्रिटिश हुक्मरान ने देश के बहुजनों को कमोबेश वे सारे अधिकार दे दिये, जिनसे मनुस्मृति की वजह से वे वंचित रहे हैं।मनुस्मृति अनुशासन के बदले कानून का राज बहाल हुआ तो नई उत्पादन प्रणाली के तहत जनमजात पेशे की मनुस्मृति अनिवार्यता खत्म हुई और शिक्षा का अधिकार सार्वजनिक हुआ।

शूद्र दासी स्त्री की मुक्ति की खिड़कियां खुल गयीं।अछूतों को सेना और पुलिस में भर्ती करके उन्हें निषिद्ध शस्त्र धारण का अधिकार मिला।तो संपत्ति और वाणिज्य के अधिकार भी मिले।मुक्तबाजार अब फिर हमसे वे सारे हकहकूक छीन रहा है।

औद्योगीकरण और शहरीकरण के मार्फत नये उत्पादन संबंधों के जरिये मेहनतकशों का वर्गीय ध्रूवीकरण एक तरफ जाति व्यवस्था के शिकंजे से भारतीय समाज को मुक्त करने लगा तो वर्गीय ध्रूवीकरण के रास्ते देश भऱ में,बल्कि पूरे महादेश में बहुजन समाज का एकीकरण होने लगा और सत्ता में भागेदारी का सिलसिला शुरु हो गया।जो अब भी जारी है।जिसे खत्म करने की हर चंद कोशिश इस युद्धोन्मादी हिंदुत्व का असल एजंडा है।

आदिवासी और किसान विद्रोह के अविराम सिलसिला जारी रहने पर जल जंगल जमीन और आजीविका के मुद्दे,शिक्षा और स्त्री मुक्ति,बुनियादी जरुरतों के तमाम मसले अनिवार्य विमर्श में शामिल हुए,जिसकी अभिव्यक्ति भारत की स्वतंत्रतता के लिए पूरे महादेश के आवाम की एकताबद्ध लड़ाई है,आजाद हिंद फौज है।सामाजिक क्रांति की दिशा में संतों के सुधार आंदोलन का सिलसिला जारी रहा तो नवजागरण के तहत सामंतवाद पर कुठाराघात होते रहे और किसान आंदोलनों के तहत मेहनतकश बहुजनों का राजनीतिक उत्थान होने लगा।

यह साझा इतिहास अब हमारी मुट्ठी में बंद सात समंदर का खून है।

हमारे दिलो दिमाग में अब मुक्तबाजार का युद्धोन्माद है।

हम आत्मध्वंस के कार्निवाल में शामिल हम कबंध नागरिक हैं और इस युद्धोन्माद के खिलाफ अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता एक दूसरे को भी देने को तैयार नहीं है।फासिज्म की पैदल सेना में तब्दील हमारी देशभक्ति का यही युद्धोन्माद है।



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Dainik jugosankha 29-09-2016.

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