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Friday, August 26, 2016

अनिवार्य संस्कृत के मुकाबले पालीभाषा शिक्षा लोकतंत्र का सवाल क्यों है? पलाश विश्वास

अनिवार्य संस्कृत के मुकाबले पालीभाषा शिक्षा लोकतंत्र का सवाल क्यों है?

पलाश विश्वास

भारत में सत्ता विमर्श सीधे तौर पर रंगभेद का सौंदर्यशास्त्र है तो जाति व्यवस्था श्रीमद्भागवत के गीतोपदेश या मनुस्मृतिविधान ही नहीं है,यह सीधे तौर पर रंगभेद है।


भारत में बिखराव,असहिष्णुता,तनाव,अलगाव,असंतोष,विभाजन के कारण जाति भेद जरुर नजर आते हैं लेकिन जातियों का यह गणित कुल मिलाकर विशुध रंगभेद है।


समाज के जातियों में बंट जाने की वजह से नस्ली विखंडन का शिकार होकर देशी नस्ल  दीगर विदेशी नस्ल की गुलाम बन जाती है और उसे इस नस्ली वर्चस्व का अहसास अपनी जाति की पहचान में कैद हो जाने की वजह से कभी नहीं होता।


गौरतलब है कि मनुस्मृति और गीतोपदेश दोनों के मुताबिक जाति व्यवस्था देशी नस्ल पर ही लागू है जबकि विदेशी विजेता नस्ल विशुध वर्ण है।सुसंस्कृत।


जाति उन्मूलन की लड़ाई इसीलिए रंगभेद के खिलाफ लड़ाई है।

चूंकि सत्तातंत्र पुरोहिती रंगभेद है और पुरोहिती भाषा देवभाषा संस्कृत है तो अनिवार्य संस्कृत के हिंदुत्व के एजंडे के मुकाबले के लिए एकदम जमीनी स्तर पर पाली भाषा की शिक्षा फौरी जरुरत है।इसके बिना समता और न्याय के लक्ष्य असंभव है।


इस मुक्तबाजारी नरसंहारी रंगभेद की अनिवार्य देवभाषा के पुरोहिततांत्रिक वर्चस्व के विरुद्ध तथागत गौतम बुद्ध के धम्म की लोक भाषा पाली की शिक्षा अनिवार्य है।बोधगया धम्म संदेश में पाली की शिक्षा का एजंडा भी शामिल है।


जन्म जन्मांतर,पाप पुण्य,कर्म फल,धर्म कर्म का सारा फंडा देवभाषा के पुरोहिती मिथक और तिलिस्म हैं जो देवभाषा संस्कृत में लिखे धर्मग्रंथों के मार्फत वैदिकी साहित्य के नाम विशुद्ध रंगभेद का कारोबार है।


इसी वैदिकी विशुद्ध रंगभेद का मुकाबला तथागत गौतम बुद्ध ने लोकभाषा पाली में धम्म प्रवर्तन से करके समता और न्याय के आधार पर समाज और राष्ट्र का पुनर्निर्माण मानव कल्याण और बहुजन हिताय की सर्वोच्च प्राथमिकता की सम्यक दृष्टि और प्रज्ञा से किया।संस्कृतभाषी देवमंडल के सत्ता आधिपात्य के खिलाफ हुई इस जनक्रांति की जनभाषा चूंकि पाली है तो आज पाली हमारी भाषा होनी चाहिए।


तथागत गौतम बुद्ध की यह धम्मक्रांति बोधिसत्व बाबासाहेब डां.भीमराव अंबेडकर मुताबिक न जीवन शैली है और न आस्था या उपासना पद्धति,यह सामाजिक क्रांति है और इसी सामाजिक क्रांति,समता और न्याय  के लक्ष्य के साथ उनके रचे भारतीय संविधान की प्रस्तावना में फिर वही तथागत गौतम बुद्ध का धम्म है।


शुरु से हमारी दिलचस्पी भाषा और साहित्य में रही है और हम बाकी सारी चीजें छोड़ते चले गये एक के बाद एक।


इतिहास,भूगोल और अर्थशास्त्र को शुरु में नजरअंदाज किया तो विज्ञान और गणित से भी नाता टूट गया।


माध्यमों और विधाओं को साधने की कोशिश में जिंदगी बिता दी और अब लगता है कि हम भाषा और साहित्य भी समझ नहीं सके हैं,सीखने की बात रही दूर।


क्योंकि हम संस्कृत की कोख से निकले रंगभेदी सौंदर्यबोध और वर्चस्ववादी व्याकरण की शुद्धता के मुताबिक माध्यमों और विधाओं में यूं ही भटकते रहे हैं।लोक,बोलियों,जन और गण की जड़ों में पैठे बिना साहित्य और भाषा का पाठ अाधा अधूरा है।अप्रासंगिक।


इतिहास, भूगोल,अर्थशास्त्र, विज्ञान और गणित पर भी शास्त्रीय पुरोहिती वर्चस्व विश्वव्यापी है और सत्ता विमर्श की भाषाओं संस्कृत,ग्रीक,लैटिन और हिब्रू का ही विश्वभर में तमाम भाषाओं, बोलियों,विषयों,माध्यमों और विधाओं पर रंगभेदी वर्चस्व है। विशुद्धता का यह रंगभेद मुक्तबाजार का विज्ञान और हथियार दोनों है तो अंध राष्ट्रवाद का मनुष्यविरोधी प्रकृतिविरोधी फासिज्म भी।


पश्चिमी भाषाओं के तमाम प्रतिमान और मिथक ग्रीक और लातिन कुलीनत्व है तो जायनी विश्वव्यवस्था  और मनुष्यताविरोधी प्रकृतिविरोधी युद्धतंत्र की भाषा हिब्रू है तो विशुध रंगभेद की देवभाषा संस्कृत है।


ये चारों भाषाएं पुरोहिती वर्चस्व की क्रमकांडी भाषाएं हैं और इन्ही में मर खप गयी हैं दुनियाभर की बोलियां,लोकभाषाएं और इन्हीं की कोख से जनमती रही है अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगीज,स्पेनिश,खड़ी बोली  जैसी सत्ता विमर्श की भाषाएं।


इसी रंगभेद में दफन है जनता का इतिहास और जनता की विरासत,मोहनजोदारो हड़प्पा से लेकर तथागत गौतम बुद्ध का धम्म भी।


भारत ही नहीं,दुनियाभर में इतिहास की निरंतरता से जुड़ने के लिए द्रविड़ भाषा तमिल जानना अनिवार्य है तो जन,गण और लोक की गहराइयों में पैठने के लिए पाली जानना अनिवार्य है और हम ये दोनों भाषाएं नहीं जानते तो समझ लीजिये कि हम बुड़बकै हैं।


पहले पाली की बात करें तो ढाई हजार साल पहले किसी राजकुमार सिद्धार्थ ने शाक्य गण की लोकपरंपरा के तहत विवाद में पराजित होने के बाद स्वेच्छा से राजमहल छोड़कर बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद जो धम्मचक्र प्रवर्तन किया,उसके तहत वे न  ईश्वर थे और न पुरोहित और उनकी भाषा जनता की बोली पाली थी,जो वैदिकी सत्ता की भाषा संस्कृत के वर्चस्व के खिलाफ सीधे जनपदों के अंतःस्थलों में जन जन के जुबान की भाषा थी।


तथागत गौतम बुद्ध ज्ञान विज्ञान की बात कर रहे थे जनभाषा पाली में,जिसे हम धम्म कहते हैं। उनके देशना सत्य की खोज के लिए मार्गदर्शन हैं जो पाली में दिये गये।


मोहनजोदारो और हड़प्पा की द्रविड़ सभ्यता की भाषा तमिल और द्रविड़ समुदायों और भाषाओं के दक्षिण भारत से गायपट्टी,पूर्व और पूर्वोत्तर के अछूत अनार्यों के अलगाव और पाली के अवक्षय के कारण ही देवभाषा और देवमंडल का यह सर्वव्यापी वर्चस्व है।


भारत ही नहीं,दुनियाभर में इतिहास की निरंतरता से जुड़ने के लिए द्रविड़ भाषा तमिल जानना अनिवार्य है तो जन,गण और लोक की गहराइयों में पैठने के लिए पाली जानना अनिवार्य है और हम ये दोनों भाषाएं नहीं जानते तो समझ लीजिये कि हम बुड़बकै हैं।



भारतीय भाषाओं के अपभ्रंश से विकसित होने तक पाली जनता की बोली थी तो बुद्धमय भारत में धम्म और राजकाज की भाषा पाली थी,जिसमें पाल वंश के बंगाल में पतन होने तक शूद्र और अस्पृश्य जनता का साहित्य और इतिहास,रोजनामचा, जिंदगीनामा था।कर्मकांड की भाषा संस्कृत न राजभाषा थी और न जनता की बोली।


सातवीं से लेकर ग्यारहवीं सदी का इतिहास तम युग क्यों कहलाता है और उस तम युग में पाली भाषा और बुद्धमय भारत का अवसान क्यों है,इसपर शोध जरुरी है।


वैदिकी संस्कृति और वैदिकी राजकाज की देवभाषा संस्कृत अब मुक्तबाजार का अनिवार्य उत्तर आधुनिक  पाठ है तो धर्म और कर्म भी है- जबकि बुद्धमय भारत की राजभाषा,धम्म की भाषा और लोकभाषा पाली की विरासत सिरे से लापता है और उसका इतिहास और साहित्य भी उसीतरह लापता है जैसे मोहनजोदारो और हड़प्पा की नगर सभ्यता का साहित्य,उनकी भाषा और उनका इतिहास।


हम आपको बार बार याद दिलाते हैं कि भारत का विभाजन दो राष्ट्रों के सिद्धांत के बहाने मोहनजोदारो और हड़प्पा की विरासत का विभाजन है।


इसे समझने के लिए रंगभेद के भूगोल को समझना बेहद जरुरी है और रंगभेदी वर्चस्व की देवभाषाओं संस्कृत,ग्रीक,लैटिन,हिब्रू और उनके महाकाव्यों,मिथकों,इतिहास,पवित्र ग्रंथों,देवदेवियों के साझा भूगोल और इतिहास को समझने की जरुरत है जो यूरेशिया में केंद्रित है और पाषाणयुग से ताम्रयुग तक मनुष्यता की विकासयात्रा के दरम्यान यही सनातन आर्य संस्कृति ने अपने सौंदर्यबोध,विशुद्धता और व्याकरण से दुनियाभर की दूसरी नस्लों को उनकी जमीन,विरासत,भाषा और पहचान से बेदखल किया है।


द्रविड़ अनार्य भूगोल सिर्फ पूर्वी भारत या दक्षिण भारत या दंडकारण्य नहीं है,इस अश्वेत अशुद्ध अनार्य भूगोल में एशिया के अलावा अफ्रीका और लातिन अमेरिका और अमेरिका तो है ही बल्कि मोहनजोदारो और हड़प्पा की नगर सभ्यता के विध्वंस से पहले मध्य एशिया और यूरोप से भी द्रविड़ों और अनार्यों की बेदखली से शुरु हुई यह वैदिकी सभ्यता और बाल्टिक सागऱ पार फिन लैंड से लेकर सोवियत साइबेरिया  और पश्चिम एशिया में भी बिखरे हैं फिन अनार्य द्रविड़,जो हमारी तरह अश्वेत भी नहीं है।


महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने मध्यएशिय़ा के इतिहास में पित्तलयुग अध्याय में पेज नंबर 63 मे लिखा हैः


ताम्रयुग में अनौ और ख्वारेज्मसे सप्तनद तक मुंडा द्रविड़ जाति की प्रधानता थी।पित्तलयुग में आर्यों और शकों के पूर्वज सारे उत्तरापथ और दक्षिणापथ में फैले।मुस्तेर और मध्य पाषाणयुगीन मानव केसंबंध में हम निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कह सकते।मध्य पाषाणयुगीन मानव,हो सकता है,नव पाषाणयुग के मुंडा द्रविड़ के ही पूर्वज हों,जो कि नव पाषाणयुग के प्रारंभ में ही यूरोप की ओर भागने के लिए मजबूर हुए।ऐसी अवस्था में मुंडा द्रविड़ वंश के लोग भूमध्यीय वंश के होने के कारण दक्षिण या दक्षिण पूुर्व से मध्य एशिया में घुसे होंगे।पित्तलयुग में मध्यएशिया खाली करके जाने वाले हिंदू यूरोपीय वंश की एक शाखा को फिर हम उनके पूर्वजों की भूमि में लौटते देखते हैं।ये ही शकों और आर्यों के जनक थे।इनके आने के बाद मुंडा द्रविड़ लोगों का क्याहुआ,शायद वहां भी वही इतिहास पहले ही दोहरा दिया गया ,जो कि भारत में पीछे हुआ,अर्थात कुथ मुंडा द्रविड़ पराधीन होकर वहीं रह गये और विजेताओं ने उन्हें आत्मसात कर लिया।कुछ लोगों ने पराधीनता स्वीकार न करके खाली पड़ी हुई जमीन पर आगे खिसक गये।


महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने मध्यएशिय़ा के इतिहास में पित्तलयुग अध्याय में पेज नंबर 63 मे लिखा हैः


अल्ताई से सिङक्याङ तक फैले मुंडा द्रविड़ जातियों के इन्ही भागे हुए अवशेषों को आज हम वोल्गा के उत्तर वनखंडों में रहने वाली कोमी और बाल्टिक के पूर्वी तट परबसनेवाली एस्तोनी और फिनलैंड में बसनेवाली फिन जाति के रुप में पाते हैं।किसी समय मास्को और लेनिनग्राद का सारा भूभाग उसी जाति का था,जिसकी शाखाएं वर्तमान कोमी ,एस्तोनी और फिन हैं।फिन भाषा का द्रविड़ भाषा से संबंध भी इसी बात की पुष्टि करता है कि शकार्यों और द्रविड़ों के संघर्ष के परिणामस्वरुप उनका एक भाग जो उत्तर की ओर भागा,वही फिन जाति है।इस प्रकार,मुंडा द्रविड़ कहने की जगह हम नवपाषाणयुग की मध्यएशियाई प्राचीन जाति को फिनो द्रविड़ कह सकते हैं।


गौरतलब है महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने फिनो द्रविड़ नृतत्व पर यह अध्ययन भारत की आजादी से पहले कर लिया था और इस अध्ययन के लिए उनके स्रोत ग्रंथ

पश्चिमी  देशों के साथ साथ सोवियत नृतत्वेत्ताओं के लिखे ग्रंथ भी थे।




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Manoranjan Byapari · দানা মাঝি ভাই আমাকে ক্ষমা করো । তোমার কাধে ওই শব ওটা আমার ই।আমিই মৃত দেহ হয়ে গেছি বলে এখনো আগুন হয়ে জ্বলে উঠতে পারিনি । ধারালো কুঠার হাতে নামতে পারিনি পথে ।আমি এখন বাজারে যাচ্ছি ।মরে চিত্তির হয়ে থাকা তেলাপিযা কিনে এনে তেল তেলে ঝোল খেয়ে বড় আরামে বউ পাশে নিয়ে শোব । আমি বড় সুখে আছি।তোমার দুঃখে কাদব সেই সময় নেই আমার । আমাকে ক্ষমা করো ভাই ।আমি আর মানুষ নেই ।মানুষের দুঃখ কষ্ট

দানা মাঝি ভাই আমাকে ক্ষমা করো । তোমার কাধে ওই শব ওটা আমার ই।আমিই মৃত দেহ হয়ে গেছি বলে এখনো আগুন হয়ে জ্বলে উঠতে পারিনি । ধারালো কুঠার হাতে নামতে পারিনি পথে ।আমি এখন বাজারে যাচ্ছি ।মরে চিত্তির হয়ে থাকা তেলাপিযা কিনে এনে তেল তেলে ঝোল খেয়ে বড় আরামে বউ পাশে নিয়ে শোব । আমি বড় সুখে আছি।তোমার দুঃখে কাদব সেই সময় নেই আমার । আমাকে ক্ষমা করো ভাই ।আমি আর মানুষ নেই ।মানুষের দুঃখ কষ্ট আমাকে বিচলিত করে না ।তা করলে আমার ধারালো কুঠার আজ বিদ্যুত চমকাতো।দক্ষের মুন্ডটা আজ লোটাত পায়ের কাছে । প্রিয় শয্যা ফেলে আজ নটরাজ নৃত্যে কাপাতাম মেদিনী ।ভাই আমি আজ আর বেচে নেই ।তাই কিছুই পারিনা আর।তোমার কাধে ওই শব ওটা আমার ই শব ।পচা গলা সমাজের শব ।


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Thursday, August 25, 2016

Kandhamal: Long Wait for Justice Ram Puniyani

Kandhamal: Long Wait for Justice

 Ram Puniyani


Today, nearly a decade later when we are remember with pain the horrific violence of Kandhmal in 2008, many issues related to the state of affairs of communal violence, state of minorities, the state of justice delivery system come to one’s mind.

The incident

Just to recall, Orissa witnessed unprecedented violence against the Christian minority in August 2008. On August 23, 2008, Swami Laxmananand along with his four followers was killed, probably by a group of Maoists. Immediately, anti-Christian violence began on a big scale. The way it began it seemed as if preparations for it were well afoot. It was systematic and widespread. It sounded as if preparation was already there just the pretext was being awaited. (1)


Christians in India

Christians are a tiny minority in India. Contrary to the perception that British brought Christianity to India, it is one of the oldest religions of India. Its spread has been slow. Not much was heard against this minority till the decade of 1990s, when suddenly it started being asserted that Christian missionaries are converting. Anti-Christian violence has been occurring more in the remote-interior places and is accompanied by another phenomenon, that of Ghar Vapasi (return home), which is the conversions of Adivasis into the fold of Hinduism, by Vishwa Hindu Parishad-Vanavasi Kalyan Ashram. (2)

It is from 1996, that this phenomenon of conversion-anti Christian violence has captured the attention of all of us. Suddenly, as if from nowhere has descended the ‘threat of conversion to Christianity’ by force or fraud. Simultaneously, attacks on priests and nuns increased in distant interior places. It has been a peculiar phenomenon that while these attacks in remote places were being undertaken, the Christian institutions in cities – schools, colleges and hospitals – were hard pressed to cope with the demands on their services related to education and health. The selective targeting of Christian missionaries in distant places was a matter of serious attention, concern and introspection.

Social Common Sense

As the ‘social common sense’ started accepting, ‘yes, they are converting’, ‘they have been converting’, a sort of silent approval of layers of society and state officials did accompany these attacks on the missionaries. One was used to hearing about attacks on Muslim minorities so far. How come a new minority came to be perceived as the ‘source of trouble’ and hence started being targeted? (3)

Anti Christian violence did begin with isolated incidents like the attack on the Catholic Health Centre of India near Latur (1996), burning of Bibles and attacks on the Christian congregations. But most shocking was the burning alive of Pastor Graham Steward Stains (1999, January) along with his two sons, Philip and Timothy, aged 9 and 7 years, who were sleeping in a jeep after a village festival. Gradually the pattern of these attacks started emerging. In the remote places where Vanvasi Kalyan Ashrams (Society for Welfare of Forest Dwellers), an outfit of RSS, have been active and doing the propaganda work along with starting of Ekal schools and have been Hinduising Adivasis, the incidents were more pronounced and intense.

Anti Christian Violence: Characteristics

The violence against Christian missionaries has by now become a matter of routine. Unlike the anti Muslim pogroms-violence, it has been scattered and generally low key, occurring at sporadic intervals. Barring few dastardly acts like Pastor Stains’ burning and Rani Maria’s being hacked to death the incidents were medium in intensity and did not take the shape of carnage or pogrom against the community till the one in Orissa (December 2007 and later August 2008). The occurrence of these incidents was mostly in places that are having rampant poverty and illiteracy. The apathy in highlighting these core issues, deprivations, by a section of media was appalling. At the same time, by word of mouth the propaganda against Christian Missionaries was intensified.


The message has been spread that Christian missionaries working in remote places are soft targets and one can get away without much reprisals. Also the anti-Christian mobilization of Adivasi youth through cultural manipulation was the groundwork on which the anti-Christian violence could sustain. In the atmosphere created by the activities of RSS progeny, local communal groups have felt emboldened to pick up any small issue and to make a violent incident out of it. Its’ frightening effect on the victims is tremendous. It also begins to polarize the local communities into Christian and non-Christian camps amongst whom the seeds of tension are sown.

Cultural:  Agenda

The physical violence has been accompanied by cultural manipulation in these areas. The silent work to Hinduise Adivasis through religio-cultural mechanisms has been stepped up from last three decades. People like Swami Aseemanand (Dangs), Swami Laxmanand (Kandhmal, Orissa), followers of Asaram Bapu (Jhabua, MP) began their work in popularizing Hindu gods and Goddesses in the region. The choice of Gods/Goddesses from the vast pantheon of Hindu religion was a clever one. Here Shabri (Symbol of poverty and deprivation) was the main goddess, the idol for Adivasis. Temples in her names were started and regular Kumbhs (mass religious congregation of Hindus) were organized in her name. Kumbhs have been a tradition in Hinduism on fixed interval of time on the banks of Holy rivers; Ganges in particular. Modifying that tradition, these Kumbhs were organized in Adivasis areas. Here the work of conversion to Hinduism, the spread of ‘Hate against’ foreigners’, particularly Christians, was spread. In addition an atmosphere of terror was created against those who do not toe the line of Vanavasi Kalyan Ashram. (4)

Similarly the God Hanuman, the foremost devotee of Lord Ram was also made popular, by spreading his lockets and through different stories around him, in the Ekal Schools and Sarswati Shishu Mandirs. It created an atmosphere of divide in the Adivasi areas; Adivasis turned Hindus, the Hindu dalits and upper caste versus the Christians. It is this atmosphere of divisiveness, which has been at the root of the violence in these areas.

Political Agenda

This has been a part of the different activities undertaken by RSS combine to promote the agenda of Hindu nation. While RSS has floated many a organizations to communalize different sections of society, BJP, VHP, Bajrang Dal, etc. it has also unleashed a set of cultural activities, set of educational institutions along with infiltration in media, bureaucracy, police and military. They are gradually imposing the idea of Hindu nation and accompanying culture and ideas. The culmination of this has been the violence against minorities, polarization of communities along religious lines and ghettoization of minorities. While all this is going on the violence against minorities’ is the most visible part of this phenomenon.

The role of state agencies has been no different in these incidents than what it has been in the anti Muslim violence. In most cases, the administration has looked the other way when communal goons were on the rampage. The administration most often provided enough leeway for them to wreck havoc, indulge in intimidation, violence and to get away with that. The Adivasi areas, which were so far peaceful, started witnessing communal tensions. The area of violence in Adivasi regions is synonymous with the map of spread of Vanvasi Kalyan Ashrams and Vishwa Hindu Parishads in an indirect way.


RSS had been floating different organizations for different sections of society; Vanvasi Kalyan Ashram, to Hinduise Adivasis was founded in 1952 and the Vishwa Hindu Parishad founded in 1964 was to play an important role in the anti Christian tirade in times to come. Another RSS progeny which, directly supported violence against Christians, Bajrang Dal, was founded by RSS in 1984. After the intimidation and browbeating of Muslim minorities, especially after the post Babri demolition Mumbai riots, they stepped up their social dominance and needed another community to target their trishuls for further expansion of their social and electoral base, and that was done by the bogey of forced conversions and accompanying anti Christian violence, which started coming to the fore from 1996 onwards. The targeting of minorities has played an important role in polarizing the communities, in consolidation of the majoritarian politics in various ways. (5)


The burning of Pastor Stains, in that sense was a turning point for Human rights groups, who so far were trying to grapple and respond to the anti Muslim violence. With this many concerned groups took up the investigations of the violence against Christians in the right earnest. As such, the first major cover up had to be undertaken by the BJP led NDA Government itself, in the aftermath of Stains murder. Initially, as a fire fighting measure, the functionaries of the NDA government tried to give a clean chit to the RSS combine. After the murder, the then home minister Lal Krishna Advani stated that he knows Bajrang Dal very well and this act could not have been done by that organization. To put a veil on the episode, the three cabinet ministers, George Fernandez, Murli Manohar Joshi and Navin Patnaik rushed to the site and proclaimed that the murder of Pastor is an international conspiracy to destabilize the BJP Government. This way they tried to bypass the real issue, i.e. involvement of Dara Singh, an activist of Bajrang Dal. (6)

Struggle for Justice: People’s Tribunals 

The case of Orissa was specifically investigated by India Peoples Tribunal, led by Justice K.K.Usha (retired) of Kerala High court in 2006. (7) This tribunal forewarns about the shape of things to come.  This tribunal assessed the spread of communal organizations in Orissa, which has been accompanied by a series of small and large events and some riots…such violations are utilized to generate the threat and reality of greater violence, and build and infrastructure of fear and intimidation. It further noted that minorities are being grossly ill treated; there is gross inaction of the state Government to take action. The report also describes in considerable detail how the cadre of majoritarian communal organizations are indoctrinated in hatred and violence against other communities it holds to be inherently inferior. If such communalization is undertaken in Orissa, it is indicative of the future of the nation… the signs are truly ominous for India's democratic future.

It is in this backdrop that when the Kandhamal carnage took place, the offense of RSS affiliates, the lapses and partisan behaviour of state machinery, the lack of rehabilitation and deliverance of justice came as a big jolt to the victims and became the matter of concern for human rights groups. The lack of proper investigation and other actions on the part of state were the key for getting justice for the victims. While many a sincere, scattered efforts to help the afflicted were undertaken by different groups. These efforts were effective but inadequate in their reach. The tribunal organized for Orissa violence under Justice A. P.Shah (Retd) brought out the truth of the carnage. The hope was that the victims will be suitably rehabiliatated and get justice. (8) 

This tribunal observed, (excerpts)
“The appalling feature of the Kandhamal violence, where rescue and relief work by non-profit, charitable and humanitarian organizations was prohibited through a government notification, indicates the impunity with which the state government acted, and its scant respect for rule of law and human rights of the victim-survivors of the violence.”...
“The dismal conditions in the government-run relief camps  are clearly indicative of the indifference of the state government to the plight of victim-survivors.”...”The testimonies of victim-survivors as well as the reports presented to the Tribunal indicate that victim-survivors were forcibly sent back to their villages, or abandoned near their villages, with total disregard to their safety.”...“Peace-building Initiatives: The fact that many victim-survivors are unable to return to their villages due to threats and intimidation by perpetrators, and many of those who have returned continue to live in constant fear and security, lead us to conclude that the state government’s peace initiatives have been a dismal failure and nothing more than an eyewash.”
It also made lot of recommendations about relief, rehaibilation, compensation and justice. This excerpt is very telling “Implementation of State’s Duty Towards Peace-building, Voluntary Return and Reintegration:  The State should recognize the Internally Displaced Persons’ right to return to their homes and create all possible enabling conditions to facilitate such safe return in accordance with the above standards. The state ought to discharge its duty of creating a conducive, safe and peaceful environment that can sustain return or re-integration of victim-survivors through access to public services, legal and personal documentation, and to livelihoods and income-generating opportunities without any form of discrimination.”
As usual the recommendations of the tribunal remain in the limbo. The heartening feature of struggle for justice in Kandhamal is the dogged determination of the victims and human rights activists to get the justice. This is also the time to understand that justice is a long term goal also which requires a programmatic alliance between the struggling sections of society, be it dalits, Adivasis, women, workers or struggling sections of society. In the light of growing intolerance in society, in the light of the growing stifling of the democracy society the need to build social alliances to preserve democracy and human rights is all the more crucial at this juncture.

Foot Notes
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Wednesday, August 24, 2016

संघम् शरणम् गच्छामि! पलाश विश्वास

संघम् शरणम् गच्छामि!

पलाश विश्वास

बोधगया धम्म संदेश के तहत हिंदुत्व में निष्णात धम्म और पंचशील और बुद्धमय भारत को नवजागरण आंदोलन में बदलना भारत में सक्रिय तमाम अंबेडकरी आंदोलनकारियों, बहुजन संगठनों और बौद्ध संगठनों का साझा कार्यक्रम बने तो शायद हम फासिज्म के मुकाबले ,अधर्म और नरसंहार के मुकाबले राष्ट्र और समाज को ब्राह्मणवादी निरंकुश रंगभेदी नस्ली सत्ता के शिकंजे से रिहा कर सकते हैं।


अधर्म के फासिस्ट राजकाज,राजकरण,राजनय और नरमेधी राजधर्म के मुकाबले के लिए धम्म ही एकमात्र रास्ता आम जनता और बहुजनों के लिए बचा है,इस पर हम सिलसिलेवार चर्चा जो कर रहे हैं,वह हवा हवाई वैचारिक कवायद नहीं है बल्कि उसे जमीनी हकीकत में बदलकर विध्वंस और विनाश के मुकाबले खड़ा होने की जरुरत है।


हम इतिहास से सबक लें तो भारत की आजादी के बाद भारत के ब्राहमणवादी सत्ता वर्चस्व के विपरीत तमाम एशियाई देशों में व्यापक जन आंदोलनों ने विभिन्न देशों के विश्वभर में सक्रिय बुद्ध धम्म संघों और संप्रदायों के समन्वय की प्रक्रिया निरंतर तेज की है और 1950 में ही श्रीलंका के कोलंबो में हुए विश्व बौद्ध सम्मेलन में विश्व बौद्ध संघ की स्थापना हो गयी।


भारत में धम्म और पंचशील को बहुजनों ने त्यागकर ब्राह्मणवादी  वर्चस्व की व्यवस्था में खुद को हिंदू दर्ज करा लिया है और इसीलिए अब उनका कोई वजूद रहा नहीं है और वे वास्तव में जी जीकर या मर मरकर नर्क जी रहे हैं।


भारत में अबतक बौद्ध संगठन अलग अलग सक्रिय रहे हैं लेकिन बाकी देशों के मुकाबले बौद्ध संगठनों का आपसी समन्वय कम रहा है।मिथ्या अहंकार,निजी स्वार्थ,मिथ्या विपश्यना में बौद्ध संघों,विहारों,मठों,संस्थानों और बहुजन अंबेडकरी संगठनों की सामाजिक निष्क्रियता और सम्यक दृष्टि के वैज्ञानिक इतिहासबोध का अभाव इसके बड़े कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है ब्राह्मणधर्म के हिंदुत्व के सनातन छलावे के तहत ब्राह्मणवाद के पुनरूत्थान में बहुजनों के वानरसेना में तब्दील हो जाना।जो इस रंगभेदी नरसंहारी संस्कृति की असल ताकत भी है।


यह सबसे बड़ी समस्या है तो ब्राह्मणवादी पुनरूत्थान के मुकाबले फिर धम्मचक्र प्रवर्तन ही प्रतिरोध और समाधान दोनों हैं। आम जनता के जिंदा बचने का एक ही रास्ता है ढाई हजार साल पहले  हुई सामाजिक क्रांति का वह धम्मचक्र प्रवर्तन।


इसी प्रसंग और संदर्भ में बौद्ध संगठनों की समन्वय समिति का गठन और बोधगया में धम्म संसद का आयोजन भविष्य की कार्य योजना के तहत संवैधानिक लड़ाई के एजंडा के साथ बौद्ध संगठनों का राष्ट्रीय संगठन और समन्वय बहुत खास इसीलिए है।


तथागत गौतम बुद्ध ने जिस ब्राह्मण धर्म और ब्राह्मणवाद के खिलाफ समाज और राष्ट्र के चरित्र में बुनियादी परिवर्तन के लिए धम्म और पंचशील की सम्यक दृष्टि से बौद्ध संघों की संस्थागत संरचना के तहत ज्ञान विज्ञान सम्मत सामाजिक  क्रांति को अंजाम दिया,आज का समाजिक यथार्थ फिर वही ब्राह्मणवादी अधर्म और नरमेधी फासिस्ट राजकाज है।


साफ जाहिर है कि जनांदोलनों के लिए इस निरंकुश ब्राह्णमवादी नस्ली  सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का एकमात्र विकल्प फिर वही तथागत गौतम बुद्ध का धम्म है और धम्म चक्र के प्रवर्तन के तहत बौद्ध विहारों,मठों और संघों को फिर ज्ञान विज्ञान के केंद्रों, विश्वविद्यालयों में तब्दील करके ही  हिंदुत्व की निरंकुश संस्थागत सत्ता और एकाधिकार नस्ली  वर्चस्व को खत्म करके समता और न्याय संभव है।वरना नहीं।


गौरतलब है कि बोधगया धम्म संदेश में सबसे ज्यादा जोर बुद्धिस्ट पर्सनल ला और बुद्धिस्ट मैरेज एक्ट पर है क्योंकि बौद्धों के लिए हिंदू पर्सनल ला और हिंदू मैरेज एक्ट लागू होने से संवैधानिक और कानूनी तौर पर तमाम बौद्ध हिंदू ही माने जायेंगे और धर्म दीक्षा का कोई मतलब नहीं रह जाता क्योंकि जनसंख्या में धर्मांतरित बौद्ध भी विष्णु के अवतार तथागत गौतम बुद्ध की तरह हिंदू ही बने रहेंगे।वैसे ही वे हिंदू बने हुए हैं और हिंदुओं की तरह ही जात पांत की नर्क जी रहे हैं।धर्मदीक्षा बेमतलब हो गयी अंदर बाहर इसी हिंदुत्व अस्मिता की निरंतरता के लिए।पहले इसे समझ लें।फिर धर्म दीक्षा।


बौद्ध संगठनों की समन्वय समिति सुप्रीम कोर्ट में यह कानूनी लड़ाई लड़ रही है। भारतीय बौद्ध संगठनों की राष्ट्रीय समन्वय समिति की भविष्य की कार्य योजना के तहत भारतीय संविधान की धारा -25 उपखंड बी के भाग दो के तहत बौद्धों की स्वतंत्र पहचान  और संवैधानिक मान्यता दिलाना समिति का मुख्य एजंडा है।


पुरातत्व विभाग को सौंपे गये तमाम बुद्ध धम्म के धर्म स्थलों को बुद्ध धर्म के अनुयायियों को सौंपने के लिए आंदोलन राष्ट्रीय बौद्ध धम्म संसद के एजंडा में खास तौर पर शामिल है।इसके तहत बौद्ध स्मारकों को पुरातत्व विभाग से भिक्षु संघ को हस्तांतरित करने  के लिए समिति संवैधानिक लड़ाई कर रही है।इसके लिए धम्म संसद ने बुद्ध विहार (Buddhist Monastery Bill) विधेयक लाकर कानूनी हक की मांग की है।


विडंबना है कि संघम् शरणम् गच्छामि का मतलब अब ब्राहमणधर्म के हिंदुत्व के संस्थागत संघ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शरण में जाना हो गया है।


जाहिर है कि जबतक आरक्षण है,तब तक हिंदुत्व का यह तिलिस्म अटूट है क्योंकि आरक्षण की वजह से गैर हिंदू तमाम समुदाय अनुसूचित होने का लाभ उठाने से चूकते नहीं हैं और लगातार हिंदुत्व को मजबूत करते हुए ब्राहमणवादी सत्ता और राष्ट्र को निरंकुश बना रहे हैं।


विडंबना है कि अल्पसंख्यकों के धर्म के बजाय बहुसंख्यकों के धर्म हिंदुत्व से जुड़कार लाभ का इकलौता सौदा अनुसूचित तमगा है,जिसे छोड़कर कोई बौद्ध हो नहीं सकता।


तथागत गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है।


तथागत गौतम बुद्ध का धम्म दुःखों से भागने के लिए दिव्य ईश्वर के अनुसंधान में समाधि नहीं है,बल्कि दुःखों के निराकरण का विज्ञान है।


तथागत गौतम बुद्ध का धम्म मानव कल्याण,बहुजन हिताय समर्पित सामाजिक सक्रियता की निरंतरता का यथार्थ है और समानता और न्याय की परिकल्पना है,जिसे संघों की शरण में जाकर ज्ञान विज्ञान की सम्यक दृष्टि,सही गलत को समझकर पंचशील अनुशीलन की प्रज्ञा के तहत अंजाम देना है।


जैसा कि बहुप्रचारित है,उसके विपरीत सच यह है कि बुद्ध के धम्म का अवसान नहीं हुआ है बल्कि बुद्ध धम्म का विश्वभर में विस्तार हुआ है और भारत से बाहर सर्वत्र बुद्ध धम्म का विकास की निरंतरता जारी है क्योंकि बाकी दुनिया में ब्राह्मणवाद की अटूट संघीय जाति व्यवस्था की संस्थागत संरचना ने संघों और भिक्षुओं  का विनाश नहीं किया है।


बुद्ध धम्म विश्वभर में मनुष्य और प्रकृति, समस्त जीवों और जीवन चक्र के हित में सत्य, शांति,अहिंसा,प्रेम,करुणा,बंधुता,भ्रातृत्व,मैत्री का पर्यावरण आंदोलन है।


बुद्धमय भारत के अवसान को ब्राह्मणवादी इतिहासकार अपनी जीत का परचम लहराते हुए बुद्ध के धम्म का अवसान बता रहे हैं। बुद्धमय भारत के अवसान की नींव पर तामीर हुआ है ब्राह्मण धर्म का नस्ली हिंदुत्व का पुनरुत्थान,मुक्तबाजारी नरसंहारी सैन्य राष्ट्र और असमानता, अन्याय, असहिष्णुता, घृणा, हिंसा, नरसंहार, मिथ्य़ा,शत्रुता, विवाद, आतंक, युद्ध और गृहयुद्ध का राजकाज,राजधर्म,राजकरण और राजनय।


इतिहास और विचारधारा ,माध्यमों और विधाओं की मृत्युघोषणा जैसे वर्चस्वी साम्राज्यवादी रंगभेद का शंखनिनाद है,वैसे ही भारत में धम्म के अवसान का ऐलान ब्राह्मण धर्म के हिंदुत्व के तिलिस्म में बदलने का सच है।जो किसी वसंत के वज्रनिनाद से भी बदला नहीं है।जो धम्म क्रांति के बिना बदलेगा भी नहीं।


विडंबना है कि बुद्धधम्म की सामाजिक क्रांति की नींव जो संघ है,ब्राह्मणधर्म के हिंदुत्व के संस्थागत संघ ने धम्म को पंथ में बदलकर,उपासना और आस्था और निष्क्रिय विपाश्यना में बदलकर उसी संघ का हिंदुत्वकरण कर दिया है।


संघ का मतलब अब ब्राह्मणवाद का संस्थागत संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है तो धम्म और पंचशील का न कोई संघ बचा है और न कोई संस्था है।


बुद्धमय भारत का हश्र यह बुद्धमय भारत का अवसान है जो हिंदू राष्ट्र में तब्दील है। लेकिन यह बुद्धधम्म का अवसान नहीं है और संस्थागत संघों के पुनर्निर्माण के तहत हम बुद्धमय भारत फिर बना सकते हैं।इसलिए बौद्ध अनुयायी ही नहीं,भारत के समस्त उत्पीड़ित वंचित बहुजनों को तथागत गौतम बुद्ध की तरह संगठित करना होगा और वह संगठन भी संस्थागत संघ संरचना बनाना होगा।कोई और विकल्प है नहीं।


इस कर्मकांडी तंत्र मंत्र यंत्र पंथ और निष्क्रिय विपाश्यना में भारत में बुद्ध धर्म के ज्ञान विज्ञान के केंद्र बने बिहार,मठ और संघों की विश्वविद्यालयी संरचना का ढहता जाना ही बुद्धमय भारत का अवसान है।बुद्धधम्म का अवसान यह कतई नहीं,नहीं है।


बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ता और सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।


बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ताऔर सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।जिसे तथागत बुद्ध के धम्म प्रवर्तन के मार्ग पर संस्थागत बौद्धसंघों,विहारों,मठों,विश्वविद्यालयों को पुनर्जीवित करके ही तैयार किया जा सकता है। मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।



भारत में बौद्ध संगठनों के लिए और उनके समन्वय समिति के लिए संघ संरचना बनाने की यह सबसे बड़ी चुनौती है तो सच यही है कि  बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ताऔर सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।संगठन और व्यक्ति के स्तर पर पंचशील की यह अग्निपरीक्षा है।



समझ लें कि भारतीय इतिहास में बहुजनों और प्रजाजनों के हकहकूक की लड़ाई और उनके वर्गीय ध्रूवीकरण के आंदोलन को तथागत बुद्ध ने जिसतरह ज्ञान विज्ञान और समाजिक यथार्थ की सम्यक दृष्टि के तहत सत्य और अहिंसा के मार्ग पर सामाजिक क्रांति में तब्दील कर दिया,वह दरअसल समाज और राष्ट्र का पुनर्निर्माण है।


बुद्धमय भारत के अवसान की पृष्ठभूमि में मनुस्मृति अनुशासन की निरंतरता ब्राह्मण धर्म के हिंदुत्व अस्मिता के तहत समता और न्याय आधारित समाज और राष्ट्र के विखंडन का अटूट सिलसिला है और उसका नतीजा यह अभूतपूर्व हिंसा, आतंक, घृणा, युद्ध और गृहयुद्ध का घना अंधियारा है कटकटेला।


ब्राहमण धर्म का पालन करने वाले ब्राह्मणों का रंगभेदी नस्लवादी कर्मकांडी हिंदुत्व बाकी लोगों ने हिंदुत्व के नाम अंगीकार किया है जबकि इतिहास और यथार्थ में हिंदू धर्म दरअसल ब्राह्मणधर्म है और इसकी सबसे बड़ी संस्था जाति व्यवस्था है।


जातिव्यवस्था की वंशगत असमान लेकिन दूसरे किसी न किसी से उंची हैसियत के हिंदुत्व के तहत गैरब्राह्मणों ने ब्राह्मणवाद को जो हिंदुत्व मान लिया,वहीं समानता और न्याय का अंत है।जिसके तहत सारे गैर ब्राह्मण ब्राह्मणों के गुलाम हैं।


बोधगया में आदरणीय भिक्खु भंतों से हमारी यही चर्चा रही है कि बोधिसत्व बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकर के लाखों अनुयायियों ने जो धर्म दीक्षा ली है,वे अबतक 22 प्रतिज्ञाओं के बावजूद ब्राह्मण धर्म का ही पालन कर रहे हैं जाति का परित्याग किये बिना जबकि बाबासाहेब ने इसी जाति व्यवस्था से मुक्ति पाने के लिए ही धर्म दीक्षा का विकल्प चुना है।


बोधगया में आदरणीय भिक्खु भंतों से हमारी यही चर्चा रही है कि जाति बनी हुई है तो धर्म दीक्षा का मतलब क्या है।धर्म दीक्षा से पहले जाति उन्मूलन अनिवार्य है वरना धर्म दीक्षा भी वैदिकी कर्मकांड है।


दरअसल भारत में तथागत बुद्ध के धम्म का वास्तविक संकट जो मनुस्मृति अनुशासन की निरंतरता के साथ जारी है,वह यही है कि जाति के दायरे में कैद है धम्म और 22 प्रतिज्ञाओं के तहत धम्म और पंचशील से धर्मांतरित बौद्धों का कोई नाता नहीं है।


वे अनुसूचित बने रहकर हिंदुत्व के संघीय संस्थागत ढांचे की शरण में बने रहकर हिंदुत्व का लाभ उठाने के चक्कर में खुद को बौद्ध भी नहीं दर्ज कराते और भारत में जनगणना में बौद्धों की संख्या जो दर्ज हुई है,वह धर्मदीक्षा के तहत नवबौद्धों की संख्या से काफी कम है।


जाहिर है कि भारत में बौद्ध संगठनों के लिए और उनके समन्वय समिति के लिए संघ संरचना बनाने की यह सबसे बड़ी चुनौती है तो सच यही है कि  बुद्ध का धम्म ही उत्पीड़ितों, वंचितों, शरणार्थियों, बहुजनों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, गैरहिंदुओं, दलितों, पिछड़ों.पीड़ितों निरंकुश सत्ताऔर सैन्यराष्ट्र के अधर्म का प्रतिरोध विकल्प है।मुक्ति मार्ग है यह एकमात्र।संगठन और व्यक्ति के स्तर पर पंचशील की यह अग्निपरीक्षा है।



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বাঙালিরা খুব আদিখ্যেতা করেই বলেন, জীবনে যখনই যেখানেই সংকট---সেখানেই বুঝি রবীন্দ্রনাথ সংকটহরণ কবি। তাঁর কথাগুলোই বুঝি দিশা দেখিয়ে দেয়। তা গুজরাটের ঘটনাক্রম দেখে শোনে সেই বাঙালি বাবু-বাবুনিদের--রবীন্দ্রনাথের রথের রশি মনে পড়ছে কী? অভিনীত হচ্ছেতো, কালের রথের চাকা দলিত মুসলমান ঐক্যের ঠেলাতে নড়ছে বলেইতো মনে হচ্ছে... এবারে কী বলেন কবি? পুরোহিতের থেকে আলাদা কিছু?


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